पुश्तैनी घर का खौफनाक सच: एक डरावनी हिंदी कहानी | Horror Story

पुराने पुश्तैनी घर के आंगन में डरावना कुआं और काली परछाइयां

ये कहानी मेरे साथ पिछले साल हुई थी और सच कहूं तो आज भी जब मैं इसके बारे में सोचता हूं तो मेरी रूह कांप जाती है। हमारे गांव में एक बहुत पुरानी परंपरा चली आ रही थी जिसे हम शहर में रहने वाले लोग हमेशा अंधविश्वास ही समझते थे। दादाजी की बरसी का वक्त था और पापा ने जिद की कि इस बार पूरा खानदान गांव वाले पुश्तैनी घर में ही इकट्ठा होगा। हमारा गांव उत्तर प्रदेश के एक बहुत ही अंदरूनी इलाके में है जहां आज भी बिजली आती-जाती रहती है और मोबाइल के नेटवर्क तो जैसे लुका-छिपी

खेलते हैं। हम लोग दोपहर के वक्त वहां पहुंचे थे। घर बहुत बड़ा था पुरानी ईंटों का बना हुआ जिसमें बड़ी-बड़ी लकड़ी की चौखटें थीं और कमरों में हमेशा एक अजीब सी सीलन भरी गंध रहती थी। आंगन के बीचों-बीच एक बहुत पुराना कुआं था जिसे अब लोहे की जाली से ढक दिया गया था लेकिन उसके अंदर झांकने पर ऐसा लगता था जैसे नीचे कोई गहरी काली दुनिया बसी हो। शाम होते-होते सब रिश्तेदार जमा हो गए और घर में थोड़ी चहल-पहल बढ़ गई थी। दादी बहुत चुप-चाप थीं और बार-बार अपनी माला जपते हुए घर के कोने-कोने में

गंगाजल छिड़क रही थीं। उन्होंने हमसे साफ कह दिया था कि बेटा शाम के छह बजे के बाद घर की दहलीज के बाहर कदम मत रखना और चाहे कोई भी पुकारे पीछे मुड़कर मत देखना। हम भाई-बहन आपस में हंस रहे थे कि दादी आज भी उन्हीं पुरानी बातों को लेकर बैठी हैं। सूरज डूबने लगा और आसमान का रंग एकदम गहरा लाल हो गया था जो धीरे-धीरे कालेपन में बदल रहा था। उस वक्त माहौल में एक अजीब सी भारीपन महसूस होने लगा जैसे हवा अचानक गाढ़ी हो गई हो। परिंदों की आवाजें बंद हो चुकी थीं और दूर

कहीं सियारों के रोने की आवाज आने लगी थी। रात के करीब आठ बजे होंगे हम सब आंगन में बैठे बातें कर रहे थे कि अचानक मेरी छोटी बहन संजना का व्यवहार थोड़ा बदलने लगा। वो जो अभी तक हंस-हंस कर बातें कर रही थी एकदम से खामोश हो गई और घर के उस पुराने मंदिर वाले कोने की तरफ एकटक देखने लगी। उसकी आंखों की पुतलियां एकदम स्थिर हो गई थीं। मम्मी ने उससे पूछा कि संजना क्या हुआ तो उसने कोई जवाब नहीं दिया बस अपनी गर्दन को धीरे से मोड़ा। उसकी गर्दन से वैसी ही आवाज आई

जैसे कोई सूखी लकड़ी टूट रही हो। उस वक्त मुझे पहली बार कुछ अजीब लगा क्योंकि संजना की आवाज जो हमेशा पतली और मीठी थी अचानक से थोड़ी भारी होने लगी। वो बुदबुदा रही थी कि वो आ रहे हैं उन्हें उनका हिस्सा चाहिए। पापा ने उसे डांटते हुए कहा कि क्या बकवास कर रही है जा जाकर पानी पी ले। लेकिन जैसे ही संजना खड़ी हुई उसके चलने का तरीका एकदम बदल गया था। वो अपने पैर घसीट कर चल रही थी जैसे उसके शरीर का भार वो खुद नहीं संभाल पा रही हो। दादी ये देखकर एकदम खड़ी

हो गईं और उनके हाथ से माला गिर गई। उन्होंने जोर से चिल्लाकर कहा कि सब अंदर चलो और किवाड़ बंद कर लो। हम सब हक्के-बक्के रह गए थे। जैसे ही हम अंदर के बड़े कमरे की तरफ बढ़े पूरे घर की लाइट चली गई। वो अंधेरा इतना घना था कि मुझे अपने हाथ भी दिखाई नहीं दे रहे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि मुझे अपने दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी। तभी अंधेरे में मुझे एक आवाज सुनाई दी। वो आवाज बिल्कुल मेरी मां जैसी थी जो बाहर आंगन से मुझे पुकार रही थी। "अविनाश जरा

बाहर आ तो बेटा देखो ये संजना को क्या हुआ है।" मैं जैसे ही बाहर की तरफ मुड़ने लगा दादी ने मेरा हाथ इतनी जोर से पकड़ा कि मुझे दर्द होने लगा। उन्होंने अंधेरे में ही मेरे कान में फुसफुसाया कि बिल्कुल मत हिलना तेरी मां यहीं मेरे पास खड़ी है। मेरा शरीर पसीने से तरबतर हो गया। अगर मम्मी अंदर हैं तो बाहर आंगन में अंधेरे में खड़ी होकर मुझे कौन बुला रहा है। वो आवाज फिर आई लेकिन इस बार उसमें एक अजीब सी थरथराहट थी जैसे कोई इंसान नहीं बल्कि कोई जानवर बोलने की कोशिश कर रहा

हो। धीरे-धीरे घर के अंदर का तापमान गिरने लगा। हमें महसूस हो रहा था कि कमरे के अंदर हमारे अलावा भी कोई और मौजूद है। एक ठंडी हवा का झोंका मेरे गले को छूकर गुजरा और मुझे लगा जैसे किसी ने बहुत करीब से मेरे कान में फूंक मारी हो। संजना जो कोने में बैठी थी अचानक से हंसने लगी। उसकी वो हंसी इतनी डरावनी और अजीब थी कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वो इंसानी हंसी बिल्कुल नहीं थी। तभी छत पर किसी के चलने की आवाज आने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी चीज ऊपर घसीटी

जा रही हो। "धप... धप... धप..." आवाज धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगी। गांव का वो पुराना सन्नाटा अब डरावनी आवाजों से भरने लगा था। खिड़की के बाहर जो पुराने बरगद का पेड़ था उसकी टहनियां कांच पर ऐसे टकरा रही थीं जैसे कोई नाखून से खुरच रहा हो। पापा ने माचिस ढूंढकर एक मोमबत्ती जलाई। उस हल्की सी रोशनी में हमने जो देखा वो देखकर सबकी सांसें अटक गई थीं। संजना कमरे के बीचों-बीच खड़ी थी लेकिन उसके पैर पीछे की तरफ मुड़े हुए थे। उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ चुका था और उसकी आंखों में सिर्फ सफेदी दिख

रही थी काला हिस्सा जैसे गायब हो गया हो। वो अजीब सी भाषा में कुछ बोल रही थी जो हमें समझ नहीं आ रहा था लेकिन दादी उसे सुनकर कांपने लगी थीं। उन्होंने कहा कि ये कुलदेवी का प्रकोप नहीं है ये वो पुरानी अतृप्त आत्मा है जो बरसों से इस घर के नीचे दबी थी और आज दादाजी की बरसी पर उसे रास्ता मिल गया है। संजना ने अचानक अपनी गर्दन पूरी 180 डिग्री घुमा दी और सीधे पापा की तरफ देखने लगी। उसकी आवाज अब बिल्कुल एक बूढ़ी औरत जैसी हो गई थी। उसने कहा कि "तुम लोग

मुझे भूल गए ना... बहुत साल हो गए इस जमीन के नीचे दम घुटते हुए... आज मुझे बलि चाहिए।" इतना कहते ही वो जोर-जोर से उछलने लगी और दीवार पर किसी छिपकली की तरह चढ़ने लगी। हम सब डर के मारे एक कोने में सिमट गए। मम्मी रोने लगी थीं और पापा कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें। तभी बाहर से किसी ने घर का मुख्य दरवाजा जोर-जोर से खटखटाना शुरू किया। "खोलो... मुझे अंदर आने दो... बहुत ठंड है बाहर..." वो आवाज बिल्कुल दादाजी की थी जो पिछले साल गुजर चुके थे। हम सबको पता था

कि वो मुमकिन नहीं है लेकिन आवाज इतनी असली थी कि एक पल के लिए पापा भी दरवाजे की तरफ बढ़ गए। दादी ने चीख कर उन्हें रोका। अचानक कमरे की मोमबत्ती बुझ गई और हमें संजना की भारी सांसें बिल्कुल अपने चेहरे के पास महसूस होने लगीं। उस अंधेरे में मुझे महसूस हुआ कि किसी के लंबे-लंबे नाखून मेरी शर्ट को पकड़ रहे हैं और कोई बहुत धीरे से मेरा नाम पुकार रहा है। "अविनाश... इधर देख... मैं यहीं हूं..." मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं आंखें खोलूं लेकिन तभी एक जोर का धमाका हुआ और आंगन

का वो भारी लकड़ी का दरवाजा अपने आप खुल गया। बाहर चांद की मद्धम रोशनी में मैंने देखा कि आंगन में एक नहीं बल्कि कई काली परछाइयां खड़ी थीं और उन सबकी नजरें सिर्फ हमारे कमरे की तरफ थीं। उन परछाइयों के पैर जमीन से थोड़े ऊपर थे और उनके चेहरे की जगह सिर्फ एक काला गड्ढा था। संजना ने अचानक चीख मारी और वो खिड़की तोड़कर बाहर की तरफ भागी। पापा और मैं उसे पकड़ने के लिए पीछे दौड़े लेकिन जैसे ही हम आंगन में पहुंचे वो सारी परछाइयां गायब हो चुकी थीं और वहां सिर्फ सन्नाटा था। लेकिन

वो सन्नाटा और भी खतरनाक था क्योंकि हमें नहीं पता था कि वो सब कहां छुप गए हैं। तभी हमें कुएं के अंदर से संजना के चिल्लाने की आवाज आई। हम भागकर कुएं के पास पहुंचे और जाली के अंदर झांका तो देखा कि संजना अंदर लटकी हुई थी लेकिन उसने रस्सी नहीं पकड़ी थी वो हवा में लटकी हुई थी और नीचे से कोई बहुत सारे हाथ ऊपर की तरफ बढ़ रहे थे उसे खींचने के लिए। संजना की वो चीखें कुएं की गहराइयों से गूंज रही थीं और हम ऊपर जाली के पास बेबस खड़े थे। पापा पागलों

की तरह जाली को खींचने लगे लेकिन वो लोहे की जाली जो बरसों से वहां थी आज जैसे जमीन का हिस्सा बन चुकी थी टस से मस नहीं हो रही थी। टॉर्च की रोशनी नीचे डाली तो देखा कि संजना का शरीर हवा में अजीब तरीके से झटके खा रहा था जैसे कोई उसे नीचे से खींच रहा हो और वो बचने की कोशिश कर रही हो। तभी कुएं के अंदर से पानी के खौलने की आवाज आने लगी जबकि वो कुआं बरसों से सूखा पड़ा था। एक सड़ी हुई गंध... जैसे मांस के सड़ने की बू होती है... पूरे

आंगन में फैल गई। अचानक संजना ने चिल्लाना बंद कर दिया और धीरे-धीरे ऊपर की तरफ देखने लगी। उसकी आंखों में अब वो सफेदी नहीं थी बल्कि उसकी आंखें पूरी तरह से काली हो चुकी थीं जैसे उनमें कोई रोशनी ही न बची हो। वो हमें देखकर एक बहुत ही डरावनी मुस्कान मुस्कुराई और फिर उसका शरीर अचानक से ढीला पड़ गया। इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते घर के अंदर से मम्मी की एक दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी। मैं और पापा संजना को वहीं छोड़कर कमरे की तरफ भागे। कमरे का नजारा देखकर मेरे पैर

जम गए। दादी फर्श पर बैठी जोर-जोर से अपना सिर दीवार पर पटक रही थीं और उनके मुंह से झाग निकल रहा था। मम्मी एक कोने में दुबक कर रो रही थीं और हाथ से इशारा कर रही थीं कि छत की तरफ देखो। जब हमने ऊपर देखा तो मेरी चीख निकल गई। छत पर खून से कुछ लिखा हुआ था... कोई पुरानी लिपि जो समझ नहीं आ रही थी लेकिन वहां से खून की बूंदें टपक रही थीं जो सीधे दादी के ऊपर गिर रही थीं। दादी अजीब आवाज में चिल्ला रही थीं कि "उसने उसे पा लिया है...

अब वो रास्ता खुल गया है।" तभी घर के सारे खिड़की-दरवाजे अपने आप जोर-जोर से खुलने और बंद होने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे घर के अंदर कोई तूफान आ गया हो। हवा इतनी तेज थी कि सारा सामान इधर-उधर उड़ने लगा। पापा ने हिम्मत जुटाकर दादी को पकड़ने की कोशिश की लेकिन जैसे ही उन्होंने दादी को छुआ दादी ने उन्हें एक हाथ से धक्का दिया और पापा कमरे के दूसरी तरफ जाकर गिरे। एक अस्सी साल की बुजुर्ग महिला में इतनी ताकत कहां से आई ये सोचकर ही मेरा दिमाग सुन्न हो गया था। अचानक पूरे घर

में सन्नाटा छा गया। हवा थम गई और रोशनी वापस आ गई। लेकिन ये रोशनी वैसी नहीं थी जैसी बल्ब की होती है... ये एक धुंधली पीली रोशनी थी जो पता नहीं कहां से आ रही थी। हम सब सहमे हुए खड़े थे तभी हमने देखा कि आंगन से कोई चलकर अंदर आ रहा है। ये संजना थी। वो बिल्कुल ठीक लग रही थी उसके कपड़े साफ थे और चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। वो धीरे से चलकर आई और मम्मी के पास बैठ गई। उसने कहा कि "मम्मी तुम लोग इतना डर क्यों रहे हो... मैं तो

बस कुएं के पास हवा खाने गई थी।" पापा और मैं एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। हमने अभी-अभी उसे कुएं के अंदर लटके देखा था तो ये कैसे मुमकिन है। दादी ने अपनी आंखें खोलीं और संजना को देखते ही वो फिर से कांपने लगीं। उन्होंने दबी आवाज में कहा कि "ये संजना नहीं है... इसके शरीर के अंदर कोई और है।" जैसे ही दादी ने ये कहा संजना का चेहरा एक पल के लिए बिगड़ा और उसकी खाल के नीचे कुछ रेंगता हुआ साफ दिखाई दिया जैसे कोई कीड़ा उसकी गर्दन से होकर गाल की तरफ जा रहा हो।

रात के साढ़े बारह बज चुके थे और अब असली खौफ शुरू होने वाला था। बाहर से फिर वही आवाजें आने लगीं... नाम लेकर बुलाने की। इस बार वो आवाज मेरी थी। बाहर कोई मेरी आवाज में पापा को पुकार रहा था। पापा जो पहले से ही डरे हुए थे अब वो पूरी तरह टूट चुके थे। उन्होंने हाथ में डंडा लिया और बाहर की तरफ जाने लगे। दादी ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन उन्होंने नहीं सुना। जैसे ही पापा ने घर की दहलीज पार की वो एकदम से रुक गए। मैंने पीछे से देखा कि आंगन में

वो सारी काली परछाइयां फिर से आ गई थीं और इस बार उनके हाथों में लंबी-लंबी लकड़ियां थीं जो जल रही थीं। लेकिन उन लकड़ियों की आग नीली थी। संजना कमरे के अंदर बैठी हमें देख रही थी और उसके चेहरे पर वो डरावनी मुस्कान और गहरी हो गई। उसने अपनी जुबान बाहर निकाली जो सामान्य से कहीं ज्यादा लंबी थी और उससे अपने चेहरे का खून चाटने लगी जो छत से गिरा था। पापा बाहर खड़े पत्थर की मूरत बन चुके थे। मैंने उन्हें आवाज दी "पापा... वापस अंदर आइये!" लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। वो धीरे-धीरे कुएं

की तरफ बढ़ने लगे जैसे कोई उन्हें सम्मोहित कर रहा हो। मैं उन्हें बचाने के लिए बाहर दौड़ा लेकिन जैसे ही मैंने आंगन में पैर रखा मुझे महसूस हुआ कि जमीन गीली और दलदली हो गई है। मेरा पैर धंसने लगा। तभी एक काली परछाई मेरे बिल्कुल सामने आई। उसका कोई चेहरा नहीं था बस धुएं जैसा कुछ था। उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने बर्फ का टुकड़ा मेरी खाल पर रख दिया हो। मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ने लगा। उस परछाई ने अपना मुंह मेरे कान के पास लाया और

एक ऐसी बात कही जो सुनकर मेरे होश उड़ गए। उसने कहा कि "तुम्हारे दादाजी ने अपनी मौत के बदले एक वादा किया था... आज वो पूरा करने का समय है।" घर के अंदर से दादी के चिल्लाने की आवाज आई "अविनाश... भाग यहां से... ये सब तुझे लेने आए हैं!" मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं भागूं कहां। पूरा घर उन परछाइयों से घिर चुका था। संजना अब कमरे से बाहर निकल आई थी और वो इंसानों की तरह नहीं बल्कि चार पैरों पर जानवर की तरह चल रही थी। वो कुएं की मुंडेर पर चढ़ गई

और पापा का हाथ पकड़ लिया। पापा की आंखों में आंसू थे लेकिन वो कुछ बोल नहीं पा रहे थे। तभी कुएं के अंदर से एक बहुत बड़ा काला हाथ बाहर निकला और उसने पापा की कमर को जकड़ लिया। वो हाथ इंसानी नहीं था उसमें लंबे काले नाखून थे और खाल मगरमच्छ जैसी खुरदरी थी। मैं चिल्लाया और पापा की तरफ भागा लेकिन संजना ने मुझे धक्का दे दिया। उसकी ताकत इतनी ज्यादा थी कि मैं आंगन के दूसरे कोने में जा गिरा। मेरा सिर दीवार से टकराया और मुझे धुंधला दिखाई देने लगा। अंधेरे में मैंने देखा कि

वो परछाइयां अब एक घेरा बनाकर नाचने लगी थीं और कोई अजीब सा मंत्र पढ़ रही थीं। कुएं के अंदर से अब पानी की जगह काला गाढ़ा खून बाहर निकलने लगा था जो पूरे आंगन में फैल रहा था। दादी कमरे की दहलीज पर खड़ी होकर कुछ जोर-जोर से पढ़ रही थीं लेकिन जैसे ही वो आगे बढ़ीं संजना ने उनकी तरफ देखा और दादी के मुंह से खून का फव्वारा फूट पड़ा। वो वहीं ढेर हो गईं। अब सिर्फ मैं मम्मी और पापा बचे थे। पापा को वो हाथ धीरे-धीरे कुएं के अंदर खींच रहा था। मम्मी कमरे के

अंदर बेहोश पड़ी थीं। मैंने हिम्मत जुटाई और कुएं की तरफ रेंगने लगा। तभी संजना ने मेरी तरफ देखा और उसकी आवाज अब किसी भारी गूंज जैसी हो गई। उसने कहा कि "अगर तू उन्हें बचाना चाहता है तो तुझे उस जगह जाना होगा जहां तेरे दादाजी ने इसे छुपाया था।" मुझे नहीं पता था कि वो किस चीज की बात कर रही है। तभी मुझे याद आया कि दादाजी के कमरे में एक पुरानी तिजोरी थी जिसे कभी किसी ने नहीं खोला था। जैसे ही मैं दादाजी के कमरे की तरफ मुड़ा मुझे अपने पीछे किसी के भारी कदमों

की आवाज सुनाई दी। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वहां कोई नहीं था लेकिन फर्श पर खून के पैर बन रहे थे जो मेरी तरफ ही आ रहे थे। कमरे के अंदर जाते ही मैंने देखा कि वहां की दीवारें पूरी तरह से काली पड़ चुकी थीं और उन पर हजारों कीड़े रेंग रहे थे। वो तिजोरी कोने में पड़ी थी। मैंने उसे खोलने की कोशिश की लेकिन वो बंद थी। तभी मेरे कान में फिर वही फुसफुसाहट हुई "चाबी वहीं है जहां अंत हुआ था।" मेरा दिमाग बिजली की तरह दौड़ा... दादाजी की चिता की राख! हम उनकी राख

का एक कलश घर ले आए थे जो अभी तक विसर्जित नहीं हुआ था। वो कलश वहीं मंदिर वाले कोने में रखा था। मैं भागकर वहां पहुंचा और जैसे ही मैंने कलश को हाथ लगाया मुझे महसूस हुआ कि वो बहुत गर्म है जैसे अभी-अभी आग से निकला हो। मैंने कलश को उलट दिया और राख के बीच में मुझे एक पुरानी लोहे की चाबी मिली जिसके ऊपर किसी जानवर के दांत का निशान बना हुआ था। मैं चाबी लेकर फिर से तिजोरी की तरफ भागा लेकिन रास्ते में संजना खड़ी थी। उसके बाल अब सफेद हो चुके थे और

उसकी खाल लटक रही थी। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा "वो मुझे दे दे... वरना तेरे बाप की जान अभी जाएगी।" मैंने देखा कि पापा का आधा शरीर कुएं के अंदर जा चुका था। मेरे पास कोई रास्ता नहीं था। मैंने जैसे ही चाबी तिजोरी में डाली और उसे घुमाया एक बहुत तेज रोशनी कमरे से बाहर निकली जिससे वो सारी परछाइयां चीखने लगीं। तिजोरी के अंदर एक पुरानी चमड़े की पोटली थी और एक डायरी। जैसे ही मैंने उस डायरी का पहला पन्ना खोला उसमें मेरा ही नाम लिखा था और तारीख आज की थी। नीचे लिखा

था कि "जो शुरू हुआ है उसे खत्म करने के लिए खून का रिश्ता ही काम आएगा।" तभी संजना ने कमरे का दरवाजा तोड़ दिया और वो हवा में उड़ती हुई मेरी तरफ झपटी... संजना की वो खौफनाक शक्ल मेरे बिल्कुल करीब थी और उसकी आंखों से अब काला पानी बह रहा था जो सीधा मेरी शर्ट पर गिर रहा था। उसने मेरा गला दबोच लिया और उसकी उंगलियां लोहे की तरह सख्त थीं। मेरा दम घुटने लगा और मुझे लगा कि बस अब सब खत्म होने वाला है। तभी मेरा हाथ फर्श पर पड़ी उस डायरी पर पड़ा। मैंने

अपनी पूरी ताकत लगाकर उस डायरी का अगला पन्ना पलटा तो वहां एक मंत्र जैसा कुछ लिखा था और उसके नीचे लिखा था कि इस श्राप को खत्म करने के लिए उस इंसान का खून चाहिए जो इस वंश की आखिरी कड़ी है। मैंने अपनी जेब से वो छोटा चाकू निकाला जो मैं अक्सर सफर में अपने पास रखता था और बिना सोचे अपनी हथेली पर एक गहरा कट मार दिया। जैसे ही मेरा खून उस डायरी और जमीन पर फैली उस काली राख पर गिरा पूरे घर में एक ऐसी चीख गूंजी जैसे हजारों लोग एक साथ दर्द से

चिल्ला रहे हों। संजना ने मेरा गला छोड़ दिया और वो पीछे की तरफ किसी फटे हुए कपड़े की तरह जा गिरी। आंगन में खड़ी वो काली परछाइयां अब धुएं में बदलने लगी थीं और कुएं से निकलने वाला वो काला खून वापस अंदर जाने लगा। मैं भागकर कुएं के पास पहुंचा और देखा कि पापा का शरीर अब भी आधा अंदर था लेकिन वो काला हाथ जो उन्हें जकड़े हुए था वो धीरे-धीरे राख बन रहा था। मैंने और मम्मी ने मिलकर पापा को ऊपर खींचा। पापा पूरी तरह बेहोश थे और उनका शरीर बर्फ जैसा ठंडा पड़ गया

था। संजना अभी भी फर्श पर पड़ी तड़प रही थी लेकिन अब उसका चेहरा धीरे-धीरे वापस अपनी असली शक्ल में आ रहा था। बाहर सुबह की पहली किरण फूटने वाली थी और जैसे ही सूरज की हल्की सी रोशनी आंगन में पड़ी वो सारा मंजर गायब हो गया। ना वहां कोई परछाई थी और ना ही वो सड़ा हुआ मांस। बस हम सब अधमरी हालत में वहां पड़े थे और दादी की लाश कमरे की दहलीज पर पड़ी थी। हम लोग उसी वक्त वहां से निकले और फिर कभी उस गांव की तरफ मुड़कर नहीं देखा। पुलिस को हमने इसे

एक डाके की घटना बताया क्योंकि सच बताते तो शायद हमें पागलखाने भेज दिया जाता। संजना अब ठीक है लेकिन वो उस रात के बारे में कुछ भी याद नहीं कर पाती। उसे बस इतना याद है कि उसे बहुत तेज प्यास लगी थी और वो पानी पीने उठी थी। पापा ने तब से आज तक एक शब्द भी नहीं बोला है वो बस गुमसुम बैठे रहते हैं और अक्सर रात को सोते हुए अपना ही नाम लेकर चिल्लाने लगते हैं। लेकिन सबसे डरावनी बात ये नहीं है। सबसे डरावनी बात ये है कि कल रात जब मैं अपने शहर

वाले घर में सो रहा था तो मुझे कुएं वाली वही सड़ी हुई गंध महसूस हुई। मैंने उठकर पानी पीने के लिए लाइट जलाई तो देखा कि मेरे बेडरूम की दीवार पर खून से वही पुरानी लिपि में कुछ लिखा हुआ था जिसे मैं पढ़ नहीं पा रहा था। और जब मैंने शीशे में देखा तो मुझे अपनी परछाई के पीछे वही काला हाथ दिखाई दिया जो मेरे कंधे की तरफ बढ़ रहा था। अब मुझे समझ आया कि दादाजी ने वो वादा खत्म नहीं किया था बल्कि उन्होंने उसे बस कुछ समय के लिए टाल दिया था। वो कर्ज

अभी भी बाकी है और वो हाथ अब मेरे बहुत करीब है। कल रात से मुझे अपने घर के बंद दरवाजे के पीछे से संजना की वही भारी आवाज सुनाई दे रही है जो कह रही है कि "अविनाश... अब तुम्हारी बारी है... वादा तो निभाना पड़ेगा।"

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