कुलदेवी का खौफ: एक रूह कंपा देने वाली सच्ची Horror Story.
ये बात करीब तीन साल पुरानी है जब मेरा दोस्त विकास अपने पूरे परिवार के साथ अपने पुश्तैनी गांव गया था। उसका गांव यूपी और एमपी के बॉर्डर के पास एक बहुत ही अंदरूनी इलाके में है। विकास के दादाजी की मौत के बाद उनका घर सालों से बंद पड़ा था और अब जमीन-जायदाद के कुछ कागजी काम के लिए वहां जाना जरूरी हो गया था। विकास के साथ उसकी पत्नी अंजलि और उसका छोटा भाई राहुल भी थे। अंजलि शहर की पली-बढ़ी लड़की थी, उसे इन सब भूत-प्रेत और जादू-टोना वाली बातों पर बिल्कुल यकीन नहीं था। वो इसे
सिर्फ पुरानी रूढ़िवादिता मानती थी। जब वो लोग गांव पहुंचे तो शाम के करीब सात बज रहे थे। गांव की सड़कों पर सन्नाटा पसर चुका था। वहां स्ट्रीट लाइट्स तो थी नहीं, बस गाड़ियों की हेडलाइट की रोशनी में वो उबड़-खाबड़ रास्ते और सड़क के किनारे खड़े पुराने पीपल के पेड़ बहुत ही डरावने लग रहे थे। जैसे-जैसे वो गांव के अंदर जा रहे थे, सन्नाटा और गहरा होता जा रहा था। विकास ने बताया कि उनके घर के पास एक बहुत पुराना मंदिर है जिसे 'कुलदेवी का स्थान' कहा जाता है। वहां के नियम बहुत सख्त थे, जैसे सूर्यास्त
के बाद वहां कोई नहीं जाता था और मंदिर के पास वाली गली में ऊंची आवाज में बात करना भी मना था। जैसे ही वो अपने पुराने घर के पास पहुंचे, अंजलि को एक अजीब सी बेचैनी होने लगी। घर बहुत बड़ा था, पुराने जमाने की ईंटों से बना हुआ और लकड़ी के भारी दरवाजों वाला। धूल की एक मोटी परत हर चीज पर जमी थी। घर खोलते ही एक ऐसी गंध आई जैसे कोई चीज बरसों से वहां सड़ रही हो। विकास ने इसे बंद घर की आम सीलन वाली बदबू कहकर टाल दिया। उन्होंने जल्दी-जल्दी एक कमरा साफ
किया और वहां रात बिताने का इंतजाम करने लगे। रात के करीब 11 बज रहे होंगे। पूरा गांव गहरी नींद में था। विकास और राहुल थक कर सो चुके थे, लेकिन अंजलि को नींद नहीं आ रही थी। उसे लग रहा था जैसे कोई खिड़की के बाहर से उसे लगातार देख रहा है। तभी उसे बाहर दालान में किसी के चलने की आहट सुनाई दी। छप-छप... जैसे कोई गीले पैरों से चल रहा हो। अंजलि ने सोचा शायद राहुल पानी पीने उठा होगा। उसने टॉर्च जलाई और कमरे का दरवाजा थोड़ा सा खोला। बाहर पूरा अंधेरा था। टॉर्च की रोशनी
में उसे फर्श पर गीले पैरों के निशान दिखे, जो सीधे पूजा घर की तरफ जा रहे थे। अंजलि को थोड़ा अजीब लगा क्योंकि पूजा घर तो सालों से बंद था और उसकी चाबी विकास के पास थी। वो दबे पांव पूजा घर की तरफ बढ़ी। जैसे-जैसे वो पास जा रही थी, उसे एक बहुत ही धीमी गुनगुनाहट सुनाई देने लगी। कोई बहुत ही भारी और फटी हुई आवाज में कुछ मंत्र जैसा पढ़ रहा था। अंजलि का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने हिम्मत जुटाकर पूजा घर के दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा पहले से ही थोड़ा खुला था।
अंदर जो उसने देखा वो देखकर उसका गला सूख गया। अंधेरे कमरे के एक कोने में एक परछाई बैठी थी। वो बहुत लंबी और अजीब तरीके से मुड़ी हुई थी। टॉर्च की रोशनी जब उस पर पड़ी, तो अंजलि की चीख निकलते-निकलते रह गई। वहां उसकी सास की पुरानी साड़ी पहनकर कोई बैठा था, जिसका चेहरा दीवार की तरफ था। वो अपनी उंगलियों से जमीन कुरेद रही थी और उसका पूरा शरीर कांप रहा था। अंजलि ने कांपती आवाज में पूछा, मां जी? आप यहां क्या कर रही हैं? (जबकि उसकी सास तो शहर में ही थी)। वो आकृति धीरे-धीरे
मुड़ने लगी। उसकी गर्दन से हड़बड़ाहट की आवाजें आ रही थी जैसे हड्डियां टूट रही हों। जैसे ही चेहरा सामने आया, अंजलि ने देखा कि उसकी आंखें पूरी तरह से सफेद हो चुकी थीं और मुंह से काला गाढ़ा खून जैसा कुछ गिर रहा था। वो अंजलि को देखकर एक ऐसी हंसी हंसी जो किसी इंसान की नहीं हो सकती थी। अचानक कमरे के सारे बर्तन अपने आप हिलने लगे और ऊपर लटका हुआ पुराना झाड़फानूस जोर-जोर से झूलने लगा। अंजलि उल्टे पैर भागी और कमरे में जाकर विकास को उठाने लगी, लेकिन विकास ऐसी गहरी नींद में था जैसे
उसे किसी ने सुला दिया हो। अंजलि रोने लगी और उसे झकझोरने लगी, तभी उसे महसूस हुआ कि कमरे के बाहर कोई उसका नाम लेकर बुला रहा है। अंजलि... ओ अंजलि... बाहर आ... देख मैं तेरे लिए क्या लाई हूं। वो आवाज बिल्कुल उसकी मां जैसी थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी कड़वाहट और क्रूरता थी। अंजलि ने खिड़की की तरफ देखा तो वहां उसे एक चेहरा दिखाई दिया जो कांच से सटा हुआ था। उस चेहरे की खाल लटक रही थी और वो खिड़की के शीशे को अपने नाखूनों से खुरच रहा था। किर्र... किर्र... वो आवाज सीधे अंजलि
के दिमाग की नसों को फाड़ रही थी। तभी राहुल की नींद खुली और उसने पूछा कि अंजलि भाभी आप रो क्यों रही हो? अंजलि ने कांपते हुए हाथ से खिड़की की तरफ इशारा किया, लेकिन वहां अब कोई नहीं था। सिर्फ कांच पर उंगलियों के लंबे निशान और कुछ मिट्टी जमी हुई थी। राहुल ने कहा कि शायद आपका वहम है, यहां कोई नहीं आ सकता। लेकिन जैसे ही राहुल कमरे से बाहर पानी लेने जाने लगा, उसने देखा कि घर के आंगन के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा गड्ढा खुदा हुआ था, जो शाम को वहां नहीं था। उस
गड्ढे के पास कुछ हड्डियां और लाल कपड़े के टुकड़े पड़े थे। विकास भी अब तक जाग चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है। उसने देखा कि अंजलि के पैर के अंगूठे पर एक गहरा कट लगा है जिससे खून निकल रहा था। अंजलि को याद ही नहीं था कि उसे चोट कब लगी। विकास ने फौरन गांव के एक जानकार तांत्रिक, जिन्हें लोग बाबा कहते थे, उन्हें बुलाने का फैसला किया। रात के करीब 2 बज रहे थे। जब वो लोग घर से बाहर निकलने की कोशिश करने लगे, तो उन्होंने
पाया कि मुख्य दरवाजा अंदर से नहीं बल्कि बाहर से किसी ने बहुत ही मजबूती से जकड़ दिया है। खिड़कियों से बाहर देखने पर उन्हें गांव की गलियों में कुछ साये घूमते हुए दिखे। वो इंसान नहीं लग रहे थे क्योंकि उनकी लंबाई बहुत ज्यादा थी और वो बहुत अजीब तरीके से लचक कर चल रहे थे। तभी घर के अंदर से एक जोर की आवाज आई, जैसे कोई बहुत भारी चीज गिरी हो। वो आवाज अंजलि के कमरे से आई थी। जब वो भागकर वहां पहुंचे, तो देखा कि अंजलि जमीन पर पड़ी तड़प रही थी। उसका शरीर धनुष
की तरह मुड़ गया था और उसकी आंखों की पुतलियां गायब हो चुकी थीं। वो अपनी ही भाषा में कुछ ऐसा बोल रही थी जो किसी को समझ नहीं आ रहा था। विकास चिल्लाया, अंजलि! ये क्या हो रहा है तुझे? अंजलि ने अचानक उसे धक्का दिया। एक दुबली-पतली लड़की में इतनी ताकत कहां से आई, ये सोचकर ही विकास के रोंगटे खड़े हो गए। अंजलि अब दीवार के सहारे ऊपर चढ़ने लगी थी, बिल्कुल एक छिपकली की तरह। उसकी आवाज बदल गई थी, अब वो एक बूढ़ी औरत की आवाज में बोल रही थी, तुमने मेरी बलि रोक दी...
तुमने उस मंदिर की मर्यादा तोड़ी है... अब तुम में से कोई इस घर से जिंदा नहीं जाएगा। पूरे घर में अचानक से एक सड़ी हुई लाश जैसी गंध फैल गई। राहुल ने देखा कि आंगन वाले गड्ढे से धुआं निकल रहा था और वहां से कुछ हाथ बाहर निकल रहे थे। मिट्टी खुद-ब-खुद हट रही थी जैसे नीचे से कोई बाहर आने की कोशिश कर रहा हो। विकास को समझ आ गया था कि ये कोई साधारण भूत-प्रेत नहीं है, ये तो कुलदेवी का वो कोप है जिसे शांत करने के लिए शायद बरसों पहले कोई डरावना अनुष्ठान किया
गया था और अब वो शक्तियां वापस अपना हक मांग रही हैं। अंजलि दीवार पर चिपकी हुई नीचे की तरफ देख रही थी और उसके मुंह से लार टपक रही थी। उसने अचानक राहुल की तरफ छलांग लगाई और उसे गले से पकड़ लिया। राहुल का दम घुटने लगा। विकास ने पास पड़ा एक डंडा उठाया लेकिन जैसे ही उसने अंजलि को छूने की कोशिश की, उसे एक जोर का झटका लगा और वो दूर जा गिरा। अंजलि के हाथ के नाखून अब लंबे और काले हो रहे थे। वो राहुल के कान में फुसफुसाई, सबसे पहले इसकी बारी है...
फिर तेरी... और फिर ये कोख जो पल रही है। विकास सन्न रह गया। अंजलि प्रेग्नेंट थी ये बात सिर्फ उन दोनों को पता थी, गांव में किसी को नहीं। तो फिर उस साये को ये कैसे पता चला? तभी घर की बिजली चली गई और पूरा घर एकदम घुप अंधेरे में डूब गया। अंधेरे में सिर्फ अंजलि की वो डरावनी हंसी गूंज रही थी और राहुल के गले से निकलने वाली घुरघुर की आवाजें। विकास अंधेरे में अपनी टॉर्च ढूंढ रहा था, तभी उसे महसूस हुआ कि उसके ठीक पीछे कोई खड़ा है और उसके गले पर किसी की
ठंडी सांसें महसूस हो रही थीं। एक हाथ ने धीरे से विकास के कंधे को छुआ। हाथ बहुत ही खुरदरा और ठंडा था, जैसे बर्फ। विकास की हिम्मत नहीं हो रही थी पीछे मुड़कर देखने की। तभी उसके कान के पास वही फटी हुई आवाज आई, विकास... क्या तुझे याद है वो रात? जब तू छोटा था और तूने उस बक्से को खोला था? विकास को धुंधली सी एक याद आई, जब वो 5 साल का था और उसने दादाजी के कमरे में एक पुराना चांदी का बक्सा देखा था जिसे कभी न खोलने की हिदायत दी गई थी। उसने
वो बक्सा खोला था और उसके अंदर एक कटी हुई जीभ और कुछ काले दाने थे। उस दिन के बाद से ही उसके दादाजी बीमार रहने लगे थे और फिर कभी ठीक नहीं हुए। क्या उस बचपन की गलती की सजा अब उसका परिवार भुगतने वाला था? अंधेरे में एक माचिस की तीली जलने की आवाज आई। सामने वाले शीशे में विकास ने देखा कि अंजलि उसके पीछे खड़ी थी, लेकिन शीशे में उसका चेहरा अंजलि का नहीं, बल्कि एक बहुत ही भयानक, जली हुई औरत का था जिसकी खाल जगह-जगह से लटकी हुई थी। उसने अपनी लंबी जीभ निकाली
और विकास के चेहरे को चाटने लगी। विकास पूरी तरह जम चुका था। तभी बाहर से किसी ने जोर-जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया। कोई चिल्ला रहा था, दरवाजा खोलो! बाहर निकलो वहां से! वो बाबा थे। लेकिन अंजलि ने अपनी गर्दन 180 डिग्री घुमाई और दरवाजे की तरफ देखकर चिल्लाई, ये मेरा शिकार है! तू दूर रह! घर के अंदर की हवा अब इतनी भारी हो गई थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। दीवारें पसीजने लगी थीं, उनमें से खून जैसा लाल पानी रिस रहा था। राहुल फर्श पर बेहोश पड़ा था और अंजलि अब विकास की
तरफ बढ़ रही थी, उसके कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे, वो हवा में तैरती हुई आ रही थी। विकास ने आंखें बंद कर लीं और भगवान का नाम लेने लगा, लेकिन तभी उसे महसूस हुआ कि अंजलि ने उसका गला पकड़ लिया है और उसे ऊपर उठा लिया है। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि विकास की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। विकास का दम घुट रहा था और उसकी आंखों के सामने धुंधलापन छाने लगा था लेकिन तभी बाहर से एक जोरदार धमाका हुआ जैसे किसी ने बहुत ही शक्तिशाली मंत्र पढ़कर दरवाजे पर प्रहार किया
हो। दरवाजा जो बाहर से जकड़ा हुआ था वो अचानक एक झटके में खुल गया और बाबा अपने हाथ में एक जलती हुई मशाल और पीतल का एक लोटा लेकर अंदर दाखिल हुए। बाबा को देखते ही अंजलि के शरीर में बैठी उस रूह ने एक ऐसी चीख मारी कि घर की खिड़कियों के शीशे चकनाचूर हो गए। उसने विकास को फर्श पर पटक दिया और खुद पीछे हटकर एक कोने में दुबक गई। उसकी आंखें अब लाल अंगारे जैसी दहक रही थीं और वो बाबा को देखकर गुर्रा रही थी। बाबा ने बिना डरे अपने लोटे से अभिमंत्रित जल
पूरे कमरे में छिड़कना शुरू किया। जैसे ही पानी की बूंदें अंजलि के शरीर पर पड़ीं उसके मांस से धुआं निकलने लगा जैसे किसी ने जलता हुआ तेजाब डाल दिया हो। वो जोर-जबरदस्ती से खुद को खुरचने लगी और अपनी ही खाल नाखूनों से उतारने लगी। बाबा चिल्लाए, विकास जल्दी कर... राहुल को उठा और आंगन की सीमा से बाहर ले जा... ये जगह अब सुरक्षित नहीं है। विकास ने लड़खड़ाते हुए राहुल को कंधे पर उठाया और बाहर की तरफ भागा। लेकिन जैसे ही वो आंगन के उस गड्ढे के पास पहुंचा वहां की मिट्टी अचानक खौलने लगी। मिट्टी
के अंदर से सड़ी हुई उंगलियां बाहर निकलीं और उन्होंने विकास का पैर पकड़ लिया। वो कोई एक हाथ नहीं था बल्कि दर्जनों हाथ थे जो उस गड्ढे से बाहर निकल रहे थे। विकास वहीं गिर पड़ा। उसने नीचे देखा तो उसकी रूह कांप गई... उन हाथों में मांस नहीं था सिर्फ काली पड़ चुकी हड्डियां थीं। बाबा ने अपनी मशाल उस गड्ढे की तरफ फेंकी और कुछ भस्म हवा में उड़ाई जिससे एक पल के लिए वो हाथ पीछे हट गए। विकास और राहुल किसी तरह घिसटते हुए घर की बाहरी दहलीज तक पहुंचे लेकिन अंजलि अभी भी अंदर
थी। बाबा ने अंजलि के सामने खड़े होकर अपनी माला घुमानी शुरू की और बड़े जोर-जोर से मंत्र पढ़ने लगे। अंजलि का शरीर हवा में तीन-चार फीट ऊपर उठ गया और वो पागलों की तरह अपना सिर इधर-उधर पटकने लगी। उसकी आवाज अब बदल चुकी थी... वो एक साथ कई लोगों की आवाजों में बोल रही थी... जैसे कोई बच्चा रो रहा हो... कोई औरत चीख रही हो और कोई बूढ़ा आदमी हंस रहा हो। उसने चिल्लाकर कहा, इसे नहीं ले जा पाओगे... ये कोख मेरी है... इस खानदान का आखिरी खून यही है और आज ये बलि चढ़ेगी। बाबा
ने चिल्लाकर विकास से पूछा, विकास... उस बक्से में क्या था जो तूने बचपन में खोला था? सच बोल वरना आज कोई नहीं बचेगा। विकास ने हांफते हुए कहा, बाबा... उसमें एक कटी हुई जीभ थी और कुछ काले दाने... और एक पुरानी चांदी की मूर्ति थी जिसका सिर टूटा हुआ था। बाबा के चेहरे पर खौफ साफ दिख रहा था। उन्होंने कहा, अनर्थ हो गया... वो कुलदेवी की मूर्ति नहीं थी... वो 'रक्त-चामुंडा' की बांधी हुई शक्ति थी जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने किसी दुश्मन को खत्म करने के लिए तांत्रिक विधि से कैद किया था। तुमने उसे आजाद कर
दिया और अब वो तुम्हारे ही वंश को खत्म करके अपनी प्यास बुझा रही है। तभी अंजलि ने अपनी उंगलियों से हवा में कुछ निशान बनाए और अचानक पूरे घर के अंदर खून की बारिश होने लगी। दीवारों से खून रिसकर फर्श पर जमा होने लगा। बदबू इतनी तेज थी कि विकास को उल्टियां होने लगीं। अंजलि ने अपनी गर्दन पूरी तरह पीछे की तरफ मोड़ ली और बाबा की तरफ लपकी। उसने बाबा के कंधे पर अपने दांत गड़ा दिए। बाबा दर्द से कराह उठे लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी जेब से एक पुरानी कील निकाली जिस
पर सिंदूर लिपटा हुआ था और उसे पूरी ताकत से अंजलि के माथे के बीचों-बीच गाड़ दिया। एक भयानक सन्नाटा छा गया। अंजलि का शरीर एकदम से ढीला पड़ गया और वो जमीन पर गिर पड़ी। बाबा हांफ रहे थे, उनका कंधा बुरी तरह लहूलुहान था। उन्होंने कहा, मैंने इसे कुछ देर के लिए शांत किया है... लेकिन ये कील ज्यादा देर इसे रोक नहीं पाएगी। हमें अभी इसी वक्त उस पुराने बरगद के पेड़ के पास जाना होगा जहां तुम्हारे दादाजी ने उस बक्से को दबाया था। असली जड़ वहीं है। विकास ने अंजलि को अपनी बांहों में उठाया।
उसका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था और उसकी सांसें बहुत धीमी चल रही थीं। वो लोग भागते हुए गांव की सुनसान गलियों से गुजरने लगे। रात के 3 बज रहे थे। पूरे गांव में अजीब सी हलचल थी। हर घर के दरवाजे बंद थे लेकिन खिड़कियों के पीछे से सफेद साये उन्हें जाते हुए देख रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा गांव ही उस खौफनाक शक्ति के वश में है। जब वो उस पुराने बरगद के पेड़ के पास पहुंचे तो वहां का नजारा देखकर विकास की चीख निकल गई। पेड़ की हर टहनी पर लाल कपड़े
में लिपटी हुई छोटी-छोटी पुतलियां लटकी हुई थीं और उन पुतलियों से रोने की आवाजें आ रही थीं। हवा अचानक बहुत ठंडी हो गई। पेड़ के पीछे से एक साया निकला... वो हुबहू विकास जैसा दिख रहा था। उसकी चाल, उसके कपड़े, सब कुछ विकास जैसा था। वो साया विकास की तरफ देखकर मुस्कुराया और बोला, "तू क्यों आया? मैं तो पहले से ही यहां हूं।" विकास को समझ नहीं आया कि वो खुद को सामने कैसे देख रहा है। बाबा ने चिल्लाकर कहा, "उधर मत देख! वो छलावा है... वो तेरी हिम्मत तोड़ रहा है। जल्दी खुदाई शुरू कर!"
विकास ने वहां पड़ी एक पुरानी कुदाल उठाई और पेड़ की जड़ों के पास पागलों की तरह खोदना शुरू किया। जैसे-जैसे वो मिट्टी हटा रहा था उसे नीचे से चीखने की आवाजें आ रही थीं। राहुल बगल में खड़ा पहरा दे रहा था लेकिन तभी उसने देखा कि बरगद के पेड़ से लटकी हुई वो पुतलियां धीरे-धीरे नीचे उतर रही थीं। वो पुतलियां अब बड़ी हो रही थीं और उनके शरीर पर मांस चढ़ने लगा था। वो सब छोटी-छोटी लड़कियां थीं जिनकी आंखें नहीं थी, सिर्फ काले गड्ढे थे। तभी अंजलि जो बेहोश थी, उसने अपनी आंखें खोलीं। लेकिन इस
बार वो चिल्लाई नहीं। उसने बहुत ही प्यार से विकास का हाथ पकड़ा और बोली, "रुको विकास... देखो नीचे क्या है।" विकास ने देखा कि मिट्टी के अंदर उस चांदी के बक्से के साथ-साथ एक छोटा सा नवजात बच्चा लेटा हुआ था। वो बच्चा बिल्कुल वैसा ही दिख रहा था जैसा विकास का होने वाला बच्चा हो सकता था। विकास का हाथ ठिठक गया। उसकी ममता जाग गई। वो उस बच्चे को उठाने के लिए आगे बढ़ा। बाबा चिल्लाए, "नहीं विकास! वो बच्चा नहीं है! वो काल-योगिनी का जाल है! मत छूना उसे!" लेकिन विकास जैसे सम्मोहित हो गया था।
उसने जैसे ही उस बच्चे को छुआ, बच्चे का चेहरा अचानक बदल गया। वो एक सड़ी हुई खोपड़ी में तब्दील हो गया और उसने विकास की कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ इतनी तेज थी कि विकास की हड्डियां चटकने लगीं। उसी वक्त अंजलि के माथे पर लगी वो कील अपने आप बाहर निकलकर गिर गई। अंजलि फिर से उसी खौफनाक रूप में आ गई। उसने बाबा को जोर से धक्का दिया और बरगद के पेड़ पर चढ़ गई। वो ऊपर से लटककर विकास की तरफ हाथ बढ़ाने लगी। उसका हाथ असाधारण रूप से लंबा हो गया था। बाबा जमीन पर
पड़े-पड़े अपना झोला ढूंढ रहे थे लेकिन तभी एक काली परछाई ने उनका झोला दूर फेंक दिया। अब वहां कोई बचाने वाला नहीं था। चारों तरफ से वो पुतलियां जो अब चुड़ैलों का रूप ले चुकी थीं, उन्हें घेर रही थीं। विकास दर्द से तड़प रहा था, उसका हाथ उस खोपड़ी की पकड़ में फंसा हुआ था। अंजलि ऊपर से उसकी गर्दन की तरफ बढ़ रही थी। तभी बिजली कड़की और रोशनी में विकास ने देखा कि उस खोपड़ी के अंदर वही चांदी की खंडित मूर्ति रखी हुई थी। बाबा चिल्लाए, "विकास... उस मूर्ति पर अपना खून चढ़ा... सिर्फ तेरे
खानदान का खून ही इस शाप को वापस अंदर खींच सकता है!" विकास ने बिना सोचे-समझे अपनी दूसरी हथेली कुदाल के पैने हिस्से पर मारी और अपना बहता हुआ खून उस मूर्ति पर छिड़क दिया। जैसे ही खून मूर्ति पर पड़ा, एक बहुत ही तेज रोशनी निकली और एक गूंजने वाली चीख सुनाई दी। अंजलि पेड़ से नीचे गिर गई और वो पुतलियां धुएं में बदल गईं। लेकिन ये खत्म नहीं हुआ था। मिट्टी के अंदर से वो चांदी का बक्सा अपने आप खुलने लगा और उसमें से एक काली धुंध निकलने लगी जो आसमान तक जा रही थी। बाबा
की आंखें फटी रह गईं। उन्होंने लड़खड़ाती आवाज में कहा, "ये... ये क्या हुआ? खून से तो इसे शांत होना चाहिए था... फिर ये जाग कैसे गई?" तभी उस धुंध के बीच से एक विशाल आकृति उभरी जिसकी आठ भुजाएं थीं और हर हाथ में एक कटा हुआ सिर था। वो कुलदेवी का रौद्र रूप था जो अब पूरी तरह बेकाबू हो चुका था। उसने अपनी एक नजर विकास पर डाली और पूरी धरती हिलने लगी। विकास को अब समझ आया कि उससे बहुत बड़ी गलती हो गई थी। वो खून चढ़ाना दरअसल एक समझौता था, शांति नहीं। अब वो
शक्ति और भी ज्यादा ताकतवर हो गई थी क्योंकि उसे वो मिल गया था जिसकी उसे सदियों से तलाश थी... एक जीवित बलि का वादा। अंजलि फिर से खड़ी हुई, लेकिन इस बार वो शांत थी। उसकी आंखों से खून के आंसू बह रहे थे। उसने विकास की तरफ देखा और सिर्फ इतना कहा, "विकास... इसने मुझे चुन लिया है। ये मुझे ले जा रही है।" और इसके साथ ही वो घने अंधेरे जंगल की तरफ भागने लगी, उसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि कोई इंसान उसका पीछा नहीं कर सकता था। विकास और राहुल हक्के-बक्के रह गए। बाबा सिर
पकड़कर बैठ गए और बोले, "अभी तो सिर्फ खेल शुरू हुआ है... वो अंजलि को उस जगह ले गई है जहां से आज तक कोई वापस नहीं आया... 'अंधेरी बावड़ी'। अगर सूरज ढलने से पहले उसे वहां से नहीं निकाला, तो वो हमेशा के लिए उसकी हो जाएगी और जो पैदा होगा... वो इंसान नहीं, महाविनाश होगा।" बाबा की बात सुनकर विकास के पैरों तले जमीन खिसक गई। 'अंधेरी बावड़ी' का नाम सुनते ही गांव के जो इक्का-दुक्का लोग खिड़कियों से झांक रहे थे, उन्होंने भी अपने दीये बुझा लिए। बाबा ने अपने जख्मी कंधे को एक कपड़े से बांधा
और बोले, "विकास, अब पीछे मुड़ने का रास्ता बंद हो चुका है। अगर अंजलि उस बावड़ी की सीढ़ियां उतर गई, तो फिर वो अंजलि नहीं रहेगी। वो उस शक्ति का 'पात्र' बन जाएगी जिसे भरने के लिए सदियों का खून भी कम है।" विकास, राहुल और बाबा जंगल के उस रास्ते पर दौड़ने लगे जो सीधा उस पुरानी बावड़ी की तरफ जाता था। चारों तरफ अजीब सी सरसराहट थी। सूखी पत्तियां बिना हवा के ही उड़ रही थीं और पेड़ों की टहनियां ऐसे झुक रही थीं जैसे कोई अदृश्य फौज उनके साथ-साथ चल रही हो। चलते-चलते अचानक राहुल रुक गया।
उसने कांपते हुए हाथ से झाड़ियों की तरफ इशारा किया। वहां अंजलि की साड़ी का एक टुकड़ा फंसा हुआ था, लेकिन उस टुकड़े पर ताजे मांस के लोथड़े चिपके थे। विकास का जी मिचलाने लगा, उसे समझ नहीं आ रहा था कि अंजलि के साथ अंदर क्या बीत रही होगी। जब वो बावड़ी के पास पहुंचे, तो वहां का मंजर देखकर उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। वो बावड़ी नहीं थी, बल्कि जमीन में धंसा हुआ एक नरक का द्वार लग रहा था। पत्थर की सीढ़ियां नीचे पाताल की तरफ जा रही थीं और वहां से ऐसी आवाजें आ रही थीं
जैसे हजारों लोग एक साथ सिसक रहे हों। बावड़ी के मुहाने पर वही काली धुंध जमी हुई थी। बाबा ने अपनी झोली से एक काला धागा निकाला और विकास और राहुल की कलाई पर बांध दिया। उन्होंने हिदायत दी, "चाहे कुछ भी हो जाए, अपनी आंखें बंद मत करना और इस धागे को मत टूटने देना। अगर तुमने अपनी पलकें झपकाईं, तो ये साये तुम्हें भ्रम में डाल देंगे।" जैसे ही उन्होंने पहली सीढ़ी पर कदम रखा, तापमान एकदम से गिर गया। विकास को अपनी ही सांसें जमती हुई महसूस हुईं। सीढ़ियों की दीवारों पर अजीब से चित्र बने थे
जिनमें इंसानों की बलि दी जा रही थी। जैसे-जैसे वो नीचे उतर रहे थे, नीचे से एक गंदी, सड़ती हुई महक और तेज होती जा रही थी। अचानक विकास को लगा कि कोई उसके कान में फुसफुसा रहा है, "विकास... बचा लो मुझे... ये मुझे मार डालेंगे।" वो अंजलि की आवाज थी। विकास रुकने ही वाला था कि बाबा ने उसका हाथ कस के पकड़ लिया और बोले, "आगे देख! वो आवाज अंजलि की नहीं, उस बावड़ी की है।" बावड़ी के सबसे निचले हिस्से में एक बहुत बड़ा चबूतरा था, जिसके चारों तरफ काला पानी भरा हुआ था। वहां अंजलि
बैठी थी, लेकिन उसकी हालत देखकर विकास की चीख निकल गई। अंजलि का शरीर फूलकर दोगुना हो गया था और उसकी खाल नीली पड़ चुकी थी। वो वहां बैठकर फर्श पर पड़े किसी चीज को बड़े चाव से खा रही थी। पास जाकर देखा तो वो एक मरा हुआ सियार था जिसे वो अपने दांतों से फाड़ रही थी। उसके बाल बिखरे हुए थे और उसकी पीठ पर काले रंग के उभार निकल आए थे। बाबा ने चिल्लाकर एक मंत्र पढ़ा और अंजलि की तरफ भस्म फेंकी। अंजलि ने सिर उठाया, उसकी आंखें अब पूरी तरह काली थीं—कोई पुतली नहीं,
सिर्फ अनंत अंधेरा। उसने एक ऐसी आवाज निकाली जो शेर के दहाड़ने और औरत के रोने का मिश्रण थी। वो एक छलांग लगाकर सीधे चबूतरे के खंभे पर चढ़ गई। बाबा ने विकास से कहा, "विकास, वो चांदी की मूर्ति जो तूने उस गड्ढे से निकाली थी, उसे उस काले पानी में फेंकना होगा! वही एक तरीका है इस द्वार को बंद करने का।" विकास ने कांपते हाथों से अपनी जेब से वो खंडित मूर्ति निकाली। लेकिन जैसे ही वो पानी की तरफ बढ़ा, अंजलि खंभे से नीचे कूदी और सीधे विकास के ऊपर आ गिरी। उसकी ताकत अब इतनी
ज्यादा थी कि उसने विकास का गला एक हाथ से दबा दिया और दूसरे हाथ से उसकी छाती की खाल नोचने लगी। विकास तड़पने लगा, उसके मुंह से खून निकलने लगा। राहुल ने अपनी जान की परवाह किए बिना अंजलि को पीछे से पकड़ा, लेकिन अंजलि ने अपनी कोहनी राहुल के पेट में इतनी जोर से मारी कि वो दूर जा गिरा और बेहोश हो गया। बाबा ने अपनी माला अंजलि के गले में डालने की कोशिश की, लेकिन अंजलि ने बाबा का हाथ पकड़कर उसे एक झटके में मरोड़ दिया। 'कड़क' की आवाज के साथ बाबा की हड्डी टूट
गई। अब वहां कोई नहीं बचा था जो उस शक्ति को रोक सके। अंजलि विकास के चेहरे के पास आई और अपनी वो लंबी, काली जीभ उसके गाल पर फेरी। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "तेरा खून बहुत मीठा है विकास... लेकिन तेरे बच्चे का खून मुझे अमर कर देगा।" तभी विकास को अपनी जेब में वो कील महसूस हुई जो बाबा ने पहले अंजलि के माथे पर गाड़ी थी और जो गिर गई थी। विकास ने अपनी पूरी ताकत जुटाई और वो कील सीधे अंजलि की कोख (पेट) के पास हवा में लहराई। उसे पता था कि वो अपने बच्चे
को चोट नहीं पहुंचा सकता, लेकिन बाबा ने कहा था कि ये कील अभिमंत्रित है। जैसे ही कील अंजलि के पेट के करीब पहुंची, उसके अंदर से एक तेज रोशनी निकली। अंजलि के शरीर के अंदर बैठी वो रूह तड़प उठी। विकास ने मौके का फायदा उठाकर वो चांदी की खंडित मूर्ति पूरी ताकत के साथ उस काले पानी के बीचों-बीच फेंक दी। जैसे ही मूर्ति पानी में गिरी, एक बहुत बड़ा धमाका हुआ। बावड़ी की दीवारें कांपने लगीं और ऊपर से पत्थर गिरने लगे। वो काला पानी उबलने लगा और उसमें से हजारों हाथ बाहर निकलकर अंजलि को नीचे
खींचने लगे। अंजलि चिल्लाती रही, रोती रही, लेकिन वो हाथ उसे छोड़ नहीं रहे थे। अचानक एक बहुत तेज काली रोशनी हुई और विकास बेहोश हो गया। अगली सुबह जब विकास की आंख खुली, तो वो बावड़ी के बाहर जंगल की जमीन पर पड़ा था। उसके पास राहुल और बाबा भी थे। बाबा का हाथ टूटा हुआ था और वो बेहोश थे। विकास पागलों की तरह अंजलि को ढूंढने लगा। थोड़ी दूर पर अंजलि पड़ी हुई थी। वो बिल्कुल सामान्य लग रही थी, जैसे गहरी नींद में सो रही हो। विकास ने उसके पास जाकर उसे हिलाया। अंजलि ने धीरे
से आंखें खोलीं, उसकी आंखें अब बिल्कुल साफ थीं। उसने विकास को देखकर एक कमजोर सी मुस्कान दी और कहा, "विकास... हम घर कब जाएंगे? मुझे बहुत बुरा सपना आया।" विकास ने उसे सीने से लगा लिया और रोने लगा। उसे लगा कि सब खत्म हो गया है। वो लोग किसी तरह गांव से बाहर निकले और अपनी गाड़ी लेकर शहर की तरफ भाग खड़े हुए। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक महीने बाद... सब कुछ ठीक लग रहा था। अंजलि की सेहत सुधर रही थी और वो अपने आने वाले बच्चे की तैयारी कर रहे थे। लेकिन एक रात,
जब विकास सो रहा था, उसे अचानक प्यास लगी। वो रसोई की तरफ गया, तो उसने देखा कि अंजलि वहां खड़ी खिड़की से बाहर देख रही थी। बाहर घनघोर अंधेरा था और बारिश हो रही थी। विकास ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, "अंजलि, इतनी रात को यहां क्या कर रही हो? चलो सो जाओ।" अंजलि धीरे से मुड़ी। उसकी मुस्कान बहुत ही अजीब और डरावनी थी। उसने विकास की तरफ देखा और बहुत ही धीमी आवाज में कहा, "वो चांदी की मूर्ति तो पानी में गिर गई विकास... लेकिन तुम्हें क्या लगा? क्या 'रक्त-चामुंडा' इतनी आसानी से
हार मान लेती है?" विकास ने नीचे देखा, तो अंजलि के पैर फर्श से तीन इंच ऊपर थे और उसके हाथ के नाखून फिर से काले पड़ रहे थे। अंजलि ने अपना हाथ अपने पेट पर रखा और धीरे से बोली, "ये बच्चा तुम्हारा नहीं है विकास... ये तो मेरा 'नया शरीर' है। बस कुछ महीने और... फिर हम सब साथ रहेंगे।" तभी बाहर बिजली कड़की और उस रोशनी में विकास ने देखा कि कमरे के कोने में उसके दादाजी का वही पुराना चांदी का बक्सा रखा था, जो उसने गांव में छोड़ दिया था। बक्सा खुला हुआ था और
उसके अंदर से वही काली धुंध धीरे-धीरे बाहर निकल रही थी। विकास की चीख उसके गले में ही दब गई। क्या ये सच में अंत था, या एक नए और भी ज्यादा खौफनाक अध्याय की शुरुआत? अंजलि की वो डरावनी हंसी अब पूरे घर में गूंज रही थी और विकास को समझ आ गया था कि वो गांव कभी उसके पीछे से छूटा ही नहीं था। अंधेरे में अंजलि की आंखें फिर से पूरी तरह काली हो गईं... और उसने विकास का नाम लेकर उसे पास बुलाया... बिल्कुल वैसे ही जैसे उस पहली रात को किसी ने बुलाया था।
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