मेरी engagement से पहले लौटा पहला प्यार | Love Story
मेरा नाम सिया है। ये कहानी मेरी है… और शायद तुम्हें लगे कि ये सिर्फ एक कहानी है, लेकिन मेरे लिए ये मेरी जिंदगी का वो हिस्सा है जिसे मैं चाहकर भी भूल नहीं पाती। सब कुछ बहुत नॉर्मल चल रहा था मेरी लाइफ में। सुबह उठना, ऑफिस जाना, घर आना… और फिर वही रोज़ की बातें। मैं अपने काम में ठीक-ठाक थी, घरवाले खुश थे, और सबसे बड़ी बात… अब उन्होंने मेरे लिए लड़का देखना शुरू कर दिया था। पहले मुझे ये सब अजीब लगता था। arranged marriage का नाम सुनते ही मन थोड़ा घबरा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे
मैंने खुद को समझा लिया था कि शायद यही सही है। हर किसी को अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना होता है… और मैंने भी सोचा कि अब वक्त आ गया है। मम्मी अक्सर कहती थीं, “सिया, अब तुम्हें भी settle हो जाना चाहिए… उम्र निकलती जा रही है।” मैं बस मुस्कुरा देती थी। सच कहूँ तो मैं भी थक गई थी खुद को समझाते-समझाते। एक दिन ऑफिस से घर आई तो देखा घर में थोड़ा अलग सा माहौल था। मम्मी-पापा दोनों कुछ ज्यादा ही खुश लग रहे थे। जैसे ही मैं अंदर गई, मम्मी ने कहा, “अच्छा हुआ तुम आ
गई, हमें तुमसे एक जरूरी बात करनी है।” मैंने बैग रखा और उनके सामने बैठ गई। दिल में हल्की सी घबराहट थी… क्योंकि मुझे अंदाजा हो गया था कि बात क्या होने वाली है। “हमने तुम्हारे लिए एक लड़का देखा है,” पापा ने सीधे कहा। बस… वही पल था। जिसके बारे में मैं कई दिनों से सोच रही थी… और अब वो सामने खड़ा था। मैंने कुछ सेकंड के लिए कुछ नहीं कहा। फिर धीरे से पूछा, “कैसा है?” मम्मी तुरंत बोलीं, “बहुत अच्छा है। दिल्ली में job करता है, family भी अच्छी है… और सबसे बड़ी बात, लड़का बहुत
समझदार है।” मैंने सिर हिलाया। अंदर से क्या महसूस हो रहा था… ये मैं खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रही थी। डर भी था, curiosity भी… और कहीं न कहीं एक खालीपन भी। “तुम चाहो तो पहले बात कर सकती हो उससे,” पापा ने कहा। मैंने हाँ कर दी। उस रात मैं अपने कमरे में थी। फोन मेरे सामने रखा था। मम्मी ने उसका नंबर दे दिया था… नाम था “आरव”। मैं नंबर को बस देखती रही। कॉल करूँ या नहीं… क्या बात करूँ… कैसी होगी बात… सब कुछ दिमाग में घूम रहा था। फिर मैंने सोचा, “चलो…
जो होगा देखा जाएगा।” मैंने कॉल कर दिया। “Hello…” उधर से एक calm सी आवाज आई। “Hello… सिया बोल रही हूँ,” मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा। “हाँ… मुझे पता था तुम कॉल करोगी,” उसने हल्की सी हंसी के साथ कहा। पहली ही बात में उसकी आवाज में एक अजीब सी confidence थी… जिससे मुझे थोड़ी राहत भी मिली। हमारी बात धीरे-धीरे शुरू हुई। उसने अपने बारे में बताया, मैंने अपने बारे में बताया। बातों का flow इतना natural था कि मुझे खुद हैरानी हो रही थी। करीब आधे घंटे बात हुई… और मुझे पहली बार लगा कि शायद arranged marriage
इतनी भी बुरी नहीं होती। उस रात मैं जल्दी सो गई… लेकिन नींद आने से पहले एक बात मेरे दिमाग में बार-बार आ रही थी — “शायद सब ठीक हो जाएगा।” अगले कुछ दिनों तक मेरी और आरव की बातें होती रहीं। कभी कॉल, कभी चैट… और धीरे-धीरे हम दोनों एक-दूसरे के comfort zone में आ गए। वो समझदार था, care करता था… और सबसे बड़ी बात, वो मुझे सुनता था। मैं खुद को convince करने लगी थी कि हाँ… यही सही है। शायद यही मेरी जिंदगी का next chapter है। लेकिन जिंदगी इतनी सीधी भी नहीं होती… ये बात
मुझे बहुत जल्द समझ आने वाली थी। एक शाम मैं ऑफिस से घर लौट रही थी। metro में भीड़ थी… और मैं अपने phone में बस कुछ scroll कर रही थी। अचानक एक notification आया। Instagram पर किसी ने message किया था। मैंने casually खोला… और जैसे ही नाम देखा, मेरी सांस एक पल के लिए रुक गई। “राहुल” ये वही नाम था… जिसे मैं सालों से भूलने की कोशिश कर रही थी। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई। मैं कुछ सेकंड तक स्क्रीन को बस देखती रही। उसका message था — “Hi… काफी
साल हो गए। कैसी हो?” बस इतना सा message… लेकिन उसके पीछे कितनी यादें छुपी थीं, ये सिर्फ मैं जानती थी। राहुल… वो लड़का जो कभी मेरी पूरी दुनिया था। कॉलेज के दिनों में हम मिले थे। शुरू में बस दोस्त थे… फिर धीरे-धीरे वो दोस्ती कुछ और बन गई। हमने कभी officially “I love you” नहीं कहा… लेकिन जो था, वो उससे कम भी नहीं था। हर छोटी-बड़ी बात हम एक-दूसरे से share करते थे। साथ में canteen जाना, notes share करना, exams की tension… सब कुछ। मुझे आज भी याद है वो दिन जब उसने पहली बार मुझे
बारिश में छाता पकड़कर घर छोड़ा था… और बिना कुछ कहे बस मुस्कुरा दिया था। उसकी वो मुस्कान… आज भी याद है। लेकिन हर कहानी perfect नहीं होती। Final year के बाद सब बदल गया। उसके घर की कुछ problems थीं… और वो अचानक दूर होता चला गया। पहले calls कम हुए, फिर messages… और एक दिन पूरी तरह से contact खत्म हो गया। मैंने बहुत कोशिश की थी उससे बात करने की… लेकिन उसने कभी जवाब नहीं दिया। और धीरे-धीरे मैंने खुद को समझा लिया कि शायद यही end था। लेकिन आज… इतने सालों बाद… उसका message फिर से
सामने था। मैंने phone बंद कर दिया। दिल में एक अजीब सा डर था… और साथ ही एक सवाल — “अब क्यों?” उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाई। एक तरफ आरव था… जिसके साथ मेरी नई जिंदगी शुरू होने वाली थी। और दूसरी तरफ राहुल… जो मेरी पुरानी जिंदगी का वो हिस्सा था जिसे मैं कभी भूल नहीं पाई। अगले दिन सुबह मैंने फिर से उसका message खोला। मैं काफी देर तक सोचती रही… जवाब दूँ या नहीं। फिर मैंने एक छोटा सा reply लिखा — “मैं ठीक हूँ। तुम कैसे हो?” बस… वहीं से सब कुछ फिर
से शुरू हो गया। उसका reply तुरंत आया — “मैं भी ठीक हूँ… पर तुम्हें बहुत miss किया।” ये पढ़कर मेरे अंदर कुछ हिल गया। मैंने खुद को समझाने की कोशिश की — “ये सब गलत है… तुम्हारी engagement होने वाली है।” लेकिन दिल… दिल इतनी आसानी से नहीं मानता। हमारी बात शुरू हुई… पहले थोड़ी awkward, फिर धीरे-धीरे वही पुरानी warmth वापस आने लगी। वो पहले जैसा ही था… वही बातें, वही care… और वही feeling जो मैं कभी भूल नहीं पाई। लेकिन इस बार situation अलग थी। अब मैं किसी और के साथ अपनी जिंदगी शुरू करने वाली
थी। और शायद यही सबसे बड़ी मुश्किल थी। एक तरफ वो इंसान था जिसे मैं कभी सच में चाहती थी… और दूसरी तरफ वो इंसान था जो मेरे future का हिस्सा बनने वाला था। मैं हर दिन खुद से लड़ रही थी। क्या सही है… क्या गलत… कुछ समझ नहीं आ रहा था। और शायद… असली कहानी अब शुरू होने वाली थी। राहुल के “मैंने तुम्हें बहुत miss किया” वाले message के बाद सब कुछ बदलने लगा था। मैं जितना खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी, उतना ही दिल बार-बार उसी तरफ खिंचता जा रहा था। मैंने कई
बार सोचा कि उससे बात करना बंद कर दूँ… लेकिन हर बार उंगलियाँ खुद-ब-खुद उसके chat पर चली जाती थीं। अगले कुछ दिनों में हमारी बात पहले से ज्यादा होने लगी। अब सिर्फ formal बातें नहीं होती थीं… बल्कि वो सब बातें होने लगीं जो कभी अधूरी रह गई थीं। एक रात उसने अचानक पूछा, “सिया… क्या तुम अब भी मुझसे नाराज़ हो?” मैं कुछ सेकंड तक कुछ नहीं लिख पाई। सच तो ये था कि नाराज़गी कब की खत्म हो चुकी थी… बस दर्द बाकी था। मैंने लिखा, “नाराज़ नहीं हूँ… बस समझ नहीं पाई थी कि तुम ऐसे
अचानक क्यों चले गए।” उसका reply थोड़ा देर से आया… “उस वक्त घर की situation बहुत खराब थी। पापा की तबीयत, financial problems… सब कुछ एक साथ आ गया था। मुझे लगा कि मैं तुम्हें उस सब में खींच लूँगा… इसलिए दूर हो गया।” मैं स्क्रीन को देखती रह गई। इतने सालों तक मैं यही सोचती रही कि उसने मुझे ignore किया… कि शायद मैं उसके लिए important नहीं थी। लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी। “तुम बता तो सकते थे…” मैंने लिखा। “हिम्मत नहीं हुई,” उसने जवाब दिया, “डर था कि तुम भी दूर हो जाओगी… इसलिए पहले ही
खुद दूर हो गया।” उसकी ये बात पढ़कर मेरे अंदर कुछ टूट सा गया… और साथ ही कुछ जुड़ भी गया। उस रात हमारी बात बहुत देर तक चली। हम दोनों ने वो सब कहा जो सालों से दिल में दबा हुआ था। लेकिन इस बार फर्क ये था कि अब मेरे सामने एक और सच्चाई खड़ी थी — मेरी होने वाली engagement। अगले दिन मम्मी ने बताया कि आरव और उसकी family अगले हफ्ते हमारे घर आ रहे हैं। सब कुछ लगभग तय हो चुका था। मैंने बस “ठीक है” कहा… लेकिन अंदर से सब कुछ उलझ चुका था।
उस शाम आरव का कॉल आया। “Hey सिया, कैसी हो?” उसकी वही calm आवाज थी। “ठीक हूँ,” मैंने कोशिश की normal रहने की। “सुना है next week हम मिल रहे हैं officially,” उसने हल्की हंसी के साथ कहा। “हाँ…” मैंने धीरे से जवाब दिया। कुछ सेकंड की खामोशी रही… फिर उसने पूछा, “तुम खुश हो न?” उसका ये सवाल सीधा दिल पर लगा। मैं जवाब देना चाहती थी… लेकिन मेरे पास कोई साफ जवाब नहीं था। “हाँ… शायद,” मैंने कहा। “शायद?” उसने तुरंत पकड़ लिया। मैंने बात टाल दी, “बस थोड़ी nervous हूँ।” “वो तो मैं भी हूँ,” उसने कहा,
“लेकिन मुझे लगता है हम अच्छे से manage कर लेंगे… तुम बहुत समझदार हो।” उसकी ये बात सुनकर मुझे guilt होने लगा। एक तरफ वो था जो मेरे साथ honestly future देख रहा था… और दूसरी तरफ मैं थी, जो अपने past में उलझी हुई थी। उस रात मैंने तय किया कि मुझे खुद से साफ होना पड़ेगा। या तो मैं पूरी तरह से आगे बढ़ूँ… या फिर पीछे मुड़कर सब कुछ समझ लूँ। अगले दिन मैंने राहुल को message किया — “हमें मिलना चाहिए।” उसका reply तुरंत आया — “मैं भी यही चाहता था।” हमने अगले दिन मिलने का
plan बनाया। मैं पूरे दिन nervous थी। इतने सालों बाद उसे face करना… आसान नहीं था। जब मैं cafe पहुँची, वो पहले से वहाँ था। वही राहुल… लेकिन थोड़ा बदला हुआ। चेहरे पर maturity थी, लेकिन आँखें वही थीं। मैं उसके सामने जाकर बैठ गई। कुछ सेकंड हम दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे… जैसे time रुक गया हो। “कैसी हो?” उसने धीरे से पूछा। “ठीक हूँ,” मैंने कहा। बात धीरे-धीरे शुरू हुई। पहले थोड़ी awkward… फिर धीरे-धीरे सब normal होने लगा। उसने अपनी life के बारे में बताया… कैसे उसने struggles face किए, कैसे सब कुछ संभाला। मैं बस
सुनती रही। फिर अचानक उसने कहा, “सिया… मैंने तुम्हें कभी नहीं भुलाया।” मैं चुप रही। “जब भी कुछ अच्छा होता था, तुम्हें बताने का मन करता था… और जब कुछ बुरा होता था, तब भी,” उसने कहा। मेरी आँखों में हल्की नमी आ गई। “लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है,” मैंने धीरे से कहा, “मेरी engagement होने वाली है।” वो कुछ सेकंड चुप रहा। “अगर मैं उस वक्त वापस आ जाता… तो क्या तुम मेरा इंतजार करती?” उसने पूछा। ये सवाल आसान नहीं था। मैंने सच बोला — “हाँ… शायद करती।” वो हल्का सा मुस्कुराया… लेकिन उस मुस्कान में
दर्द साफ दिख रहा था। “तो फिर अब क्यों नहीं?” उसने पूछा। मैंने उसकी तरफ देखा, “क्योंकि अब मैं अकेली नहीं हूँ इस decision में। मेरे parents हैं… उनकी expectations हैं… और एक इंसान है जो मुझ पर trust कर रहा है।” वो चुप हो गया। “और तुम?” उसने फिर पूछा, “तुम क्या चाहती हो?” ये सवाल… शायद सबसे मुश्किल था। मैंने खुद से ये सवाल कई बार पूछा था… लेकिन जवाब हर बार बदल जाता था। मैंने गहरी सांस ली और कहा, “मैं clarity चाहती हूँ… ताकि बाद में regret ना हो।” उसने सिर हिलाया। “तो एक काम करो,”
उसने कहा, “जो तुम्हें सही लगे, वही करो… इस बार खुद के लिए सोचो, किसी और के लिए नहीं।” उस दिन हम बिना किसी conclusion के अलग हो गए। लेकिन इस बार मेरे अंदर clarity आने लगी थी। मैंने अगले दो दिन खुद को पूरी तरह से time दिया। ना राहुल से बात की… ना आरव से। बस खुद से सवाल किए। क्या मैं राहुल के साथ खुश रह पाऊँगी? क्या मैं आरव के साथ honest रह पाऊँगी? क्या मैं अपने parents को hurt कर सकती हूँ? और सबसे बड़ा सवाल — क्या ये प्यार है… या सिर्फ अधूरी कहानी
का असर? तीसरे दिन मैंने फैसला कर लिया। मैंने सबसे पहले आरव को call किया। “मुझे तुमसे एक जरूरी बात करनी है,” मैंने कहा। “हाँ, बोलो,” उसने calmly जवाब दिया। “मैं… ये engagement आगे नहीं बढ़ा सकती,” मैंने सीधे कहा। कुछ सेकंड की खामोशी रही। “कोई और है?” उसने पूछा। मैंने झूठ नहीं बोला, “हाँ… कोई था… और शायद अभी भी है।” उसने गहरी सांस ली। “Thank you, सच बताने के लिए,” उसने कहा, “शायद ये decision अभी लेना ही बेहतर है।” उसकी ये maturity देखकर मुझे और guilt हुआ… लेकिन साथ ही respect भी। कॉल कट होने के बाद
मैंने मम्मी-पापा को सब बताया। वो hurt हुए… नाराज़ भी हुए… लेकिन मैंने पहली बार अपनी feelings इतनी clearly रखी थीं कि वो धीरे-धीरे समझने लगे। उसके बाद मैंने राहुल को call किया। “मैंने engagement तोड़ दी,” मैंने कहा। कुछ सेकंड तक वो कुछ नहीं बोला। “सच में?” उसने धीरे से पूछा। “हाँ… लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सब आसान हो जाएगा,” मैंने कहा। “मुझे पता है,” उसने कहा, “लेकिन इस बार मैं कहीं नहीं जाऊँगा।” उसकी ये बात सुनकर पहली बार मुझे सुकून मिला। आज उस बात को एक साल हो चुका है। मैं और राहुल अभी भी
साथ हैं… धीरे-धीरे, समझदारी के साथ। हमने कोई जल्दबाजी नहीं की… बस इस बार हर चीज को सही तरीके से किया। कभी-कभी मैं सोचती हूँ… अगर वो वापस नहीं आता, तो शायद मेरी जिंदगी कुछ और ही होती। लेकिन एक बात मैंने सीख ली — कभी-कभी जिंदगी हमें दूसरा मौका देती है… लेकिन फैसला हमें खुद लेना पड़ता है। और उस दिन मैंने पहली बार… सच में अपने दिल की सुनी थी।

Comments
Post a Comment