शादी का खौफनाक वीडियो | Real Horror Story

शादी के मंडप के पीछे खड़ी सफेद साड़ी वाली डरावनी औरत - हिंदी हॉरर स्टोरी

एक गांव में 10 साल पुरानी शादी का वीडियो… जो किसी को देखने नहीं दिया जाता।कहते हैं उस वीडियो में कुछ ऐसा कैद हो गया था जो होना ही नहीं चाहिए था।एक लड़का वो वीडियो चुपके से देख लेता है… और उसके बाद उसके घर में वही चीज़ें होने लगती हैं जो उस शादी में हुई थीं।


 हमारे गाँव में एक बात बहुत सालों से चली आ रही है… और अजीब बात ये है कि इस बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता। अगर तुम किसी बुजुर्ग से भी पूछोगे, तो वो बस इतना ही कहेंगे — “पुरानी बात है, भूल जा।” लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो भूलने से नहीं भूलती… वो खुद वापस आ जाती हैं। ये कहानी मुझे मेरे मामा ने सुनाई थी… और उन्होंने ये भी कहा था कि “अगर सुनने के बाद कुछ अजीब लगे, तो अकेले मत रहना।” ये बात


लगभग 10-12 साल पुरानी है। हमारे गाँव से थोड़ी दूर एक और गाँव है — भैरवपुर। छोटा सा गाँव, चारों तरफ खेत, बीच में कुछ कच्चे-पक्के घर। वहीं पर एक शादी हुई थी… साधारण सी, जैसे हर गाँव में होती है। ढोल, नगाड़े, खाना, नाच-गाना — सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन उस शादी में एक चीज़ अलग थी… और वो था वीडियो कैमरा। उस समय गाँव में वीडियो रिकॉर्डिंग इतनी आम नहीं थी। इसलिए पूरे गाँव में चर्चा थी कि “इस बार शादी की फिल्म बनेगी।” एक शहर


से आदमी आया था कैमरा लेकर — नाम था दीपक। वो हर चीज़ रिकॉर्ड कर रहा था… बारात, हंसी-मज़ाक, औरतों का गाना, सब कुछ। शाम तक सब सामान्य था… लेकिन असली बात रात को शुरू हुई। रात करीब 12 बजे की होगी… जब फेरे होने वाले थे। सब लोग मंडप के पास जमा थे… हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे… और बीच-बीच में बिजली भी जा रही थी। दीपक कैमरा लेकर हर चीज़ शूट कर रहा था। लेकिन उसी दौरान उसने पहली बार कुछ


अजीब notice किया। कैमरे की स्क्रीन में उसे भीड़ के पीछे एक औरत दिखाई दी… सफेद साड़ी में। पहले तो उसे लगा कोई रिश्तेदार होगी… लेकिन अजीब बात ये थी कि वो औरत बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। ना हिल रही थी… ना किसी से बात कर रही थी… बस सीधा कैमरे की तरफ देख रही थी। दीपक ने कैमरा हटाकर असली में देखने की कोशिश की… लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसने सोचा शायद आँखों का धोखा है… और फिर से कैमरे में देखा। इस बार वो औरत और साफ


दिख रही थी… पहले से थोड़ी करीब। उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था… लेकिन आँखें… सीधी कैमरे के अंदर घुसती हुई लग रही थीं। दीपक थोड़ा घबरा गया… लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया। गाँव में काम था, पैसे लेने थे… इसलिए उसने ignore किया और शूट करता रहा। फेरे शुरू हुए… मंत्र पढ़े जा रहे थे… सब लोग ध्यान से देख रहे थे। और तभी… कैमरे की स्क्रीन में वो औरत अब मंडप के बिल्कुल पास खड़ी थी। लेकिन असली में… वहाँ कोई नहीं था। दीपक के


हाथ कांपने लगे… उसने कैमरा नीचे कर दिया। उसने अपने पास खड़े एक लड़के से पूछा — “भाई, यहाँ कोई सफेद साड़ी वाली औरत खड़ी है क्या?” लड़के ने इधर-उधर देखा… फिर बोला, “नहीं तो… तू ठीक है ना?” दीपक ने जबरदस्ती हंस दिया… लेकिन उसके माथे पर पसीना आ गया था। उसने फिर से कैमरा उठाया… और जैसे ही स्क्रीन देखी… इस बार वो औरत बहुत पास थी। इतनी पास… कि उसका चेहरा लगभग पूरा फ्रेम में था। और अब पहली बार उसका चेहरा साफ दिखा। आँखें पूरी काली…


बिना पलक झपकाए सीधे देखती हुई… और होंठ… जैसे किसी ने खींच कर मुस्कान बना दी हो। दीपक का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने तुरंत कैमरा बंद कर दिया। उस रात उसने बाकी शूटिंग जल्दी-जल्दी खत्म की और चुपचाप अपने कमरे में चला गया। उसने सोचा सुबह निकल जाएगा… और ये सब भूल जाएगा। लेकिन असली परेशानी तो अभी शुरू हुई थी। अगले दिन दीपक शहर लौट गया। उसने वीडियो को एडिट करने के लिए अपने कंप्यूटर में डाला। शुरुआत के कुछ घंटे सब सामान्य थे… बारात, हंसी-मजाक, सब


कुछ ठीक। लेकिन जैसे ही वो रात वाले हिस्से पर पहुँचा… वीडियो अपने आप रुक गया। स्क्रीन पर बस एक ही फ्रेम अटक गया था… वही औरत। इस बार वो कैमरे के बिल्कुल सामने खड़ी थी… और धीरे-धीरे… उसके चेहरे पर मुस्कान और बड़ी होती जा रही थी। दीपक ने घबराकर वीडियो बंद किया… लेकिन तभी उसके कमरे में कुछ गिरने की आवाज आई। उसने पीछे मुड़कर देखा… उसके कमरे का दरवाज़ा धीरे-धीरे अपने आप बंद हो रहा था। दीपक ने सोचा शायद हवा होगी… लेकिन खिड़की बंद थी। कमरे


में अचानक बहुत ठंड हो गई। उसने जल्दी से कंप्यूटर बंद करने की कोशिश की… लेकिन स्क्रीन खुद-ब-खुद फिर चालू हो गई। और इस बार… वीडियो खुद चलने लगा। लेकिन ये वही फुटेज नहीं था जो उसने शूट किया था। इसमें वही मंडप था… वही लोग… लेकिन सबके चेहरे अजीब थे… जैसे कोई भाव ही नहीं। और बीच में… वो औरत खड़ी थी। इस बार वो कैमरे की तरफ नहीं… सीधे दीपक की तरफ देख रही थी। और फिर… स्क्रीन के अंदर से ही उसकी आवाज आई — “देख लिया…


अब तू भी देखेगा…” दीपक जोर से चिल्लाया और कंप्यूटर का प्लग निकाल दिया। कमरा पूरी तरह शांत हो गया। लेकिन उस दिन के बाद दीपक कभी पहले जैसा नहीं रहा। कुछ ही दिनों में वो बीमार पड़ गया… और बार-बार एक ही बात बोलता था — “वो वीडियो मत चलाना… वो बाहर आ जाएगी…” ये सब बात गाँव में धीरे-धीरे फैल गई… लेकिन किसी ने उस वीडियो को देखने की हिम्मत नहीं की। वो सीडी एक लोहे के डिब्बे में बंद करके रख दी गई… और सबको सख्त मना


कर दिया गया कि उसे कोई हाथ भी नहीं लगाएगा। अब यहाँ से मेरी कहानी शुरू होती है। मैंने ये सब पहले मज़ाक समझा था… जब तक कि एक दिन… वो वीडियो मेरे हाथ में नहीं आ गया। उस दिन दोपहर का समय था। मैं मामा के घर गया हुआ था। घर के पीछे एक छोटा सा स्टोर रूम है… पुरानी चीज़ें, बक्से, टूटी चारपाई, ऐसे ही सब रखा रहता है। मामा बाहर गए हुए थे। मैं ऐसे ही टाइम पास करने के लिए अंदर चला गया। धूल भरी अलमारी


के नीचे एक लोहे का डिब्बा रखा था… थोड़ा जंग लगा हुआ। पता नहीं क्यों… लेकिन जैसे ही मैंने उसे देखा, अंदर से एक अजीब सा खिंचाव महसूस हुआ। जैसे कोई कह रहा हो — “इसे खोल…” मैंने खुद को समझाया… “फालतू चीज़ होगी…” लेकिन हाथ अपने आप आगे बढ़ गया। डिब्बा खोला… अंदर एक पुरानी सी सीडी पड़ी थी। ऊपर मार्कर से लिखा था — “शादी — भैरवपुर” मेरे दिमाग में तुरंत वही कहानी घूम गई जो मामा ने सुनाई थी। एक सेकंड के लिए लगा कि इसे वापस


रख दूँ… लेकिन फिर वही सोच — “देखते हैं आखिर ऐसा क्या है…” घर में पुराना DVD प्लेयर रखा था। मैंने सीडी निकाली… हाथ में लेते ही एक अजीब सी ठंड महसूस हुई। जैसे बर्फ पकड़ ली हो। मैंने जल्दी से उसे प्लेयर में डाला… और टीवी ऑन किया। शुरुआत बिल्कुल सामान्य थी… बारात, लोग हँस रहे हैं, बच्चे भाग रहे हैं, वही गाँव का माहौल। मैं खुद हँसने लगा — “बस इतनी सी बात के लिए इतना डर?” लेकिन जैसे-जैसे वीडियो आगे बढ़ा… मेरे अंदर का हँसना धीरे-धीरे खत्म


होने लगा। रात वाला सीन आया। मंडप… फेरे… सब कुछ वही। और फिर… मैंने उसे देखा। भीड़ के पीछे… एक सफेद साड़ी। पहले धुंधली… फिर धीरे-धीरे साफ। मेरी साँस थोड़ी भारी हो गई। मैंने सोचा pause कर दूँ… लेकिन उंगलियाँ जैसे जाम हो गई थीं। वीडियो खुद चलता रहा। और फिर वो औरत… धीरे-धीरे फ्रेम में आगे आने लगी। हर सेकंड के साथ… और पास। मेरे कानों में अचानक एक हल्की सी आवाज आने लगी… जैसे कोई बहुत धीरे-धीरे फुसफुसा रहा हो। मैंने इधर-उधर देखा… कमरा खाली था। लेकिन आवाज


बंद नहीं हुई। अब साफ सुनाई दे रहा था — “देख रहा है…?” मेरे हाथ काँप गए। मैंने रिमोट उठाकर टीवी बंद करना चाहा… लेकिन टीवी बंद ही नहीं हुआ। स्क्रीन पर अब वो औरत बिल्कुल सामने थी। वही काली आँखें… वही खिंची हुई मुस्कान। और फिर… वो अचानक हिली। पहली बार। उसने अपना सिर थोड़ा तिरछा किया… और सीधा मेरी तरफ देखने लगी। ऐसा लगा जैसे वो स्क्रीन के अंदर नहीं… यहीं कमरे में खड़ी है। मैं पीछे हट गया। दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि आवाज सुनाई


दे रही थी। और तभी… टीवी के अंदर से आवाज आई — “तूने क्यों देखा…?” मैं चिल्लाया — “कौन है?!” अचानक पूरे घर की बिजली चली गई। पूरा अंधेरा। बस टीवी की स्क्रीन चालू थी… और उसी में वो औरत खड़ी थी। अब उसकी मुस्कान धीरे-धीरे खत्म हो रही थी… और उसकी आँखें और गहरी होती जा रही थीं। जैसे कोई गड्ढा हो… जिसमें खिंचते चले जाओ। और फिर… टीवी अपने आप बंद हो गया। पूरा सन्नाटा। मैं कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा… हिल भी नहीं पा रहा था।


फिर अचानक… मेरे पीछे से किसी के चलने की आवाज आई। ठक… ठक… ठक… धीरे-धीरे। मैंने पीछे मुड़ने की हिम्मत नहीं की। आवाज और पास आ रही थी। ठक… ठक… ठक… अब ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरे बिल्कुल पीछे खड़ी है। मेरी साँस रुक गई। और फिर… मेरे कान के पास बहुत धीमी आवाज आई — “अब तू भी आएगा…” मैंने झटके से पीछे मुड़कर देखा। वहाँ कोई नहीं था। लेकिन कमरे की हवा… बहुत ठंडी हो चुकी थी। मैं बिना कुछ सोचे दौड़ता हुआ बाहर भागा। उस


दिन के बाद… सब कुछ बदल गया। पहली रात… मैं सो रहा था। करीब 2 बजे मेरी आँख खुली। कमरे में हल्की सी रोशनी थी। मैंने देखा… मेरे कमरे के कोने में कोई खड़ा है। सफेद साड़ी। मैं जम गया। वो धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगी। मैंने आँखें बंद कर ली। जब दोबारा खोली… वो गायब थी। दूसरी रात… मेरे फोन में अपने आप वीडियो चलने लगा। वही शादी वाला। मैंने फोन बंद किया… लेकिन वीडियो चलता रहा। और इस बार… स्क्रीन में सिर्फ वो औरत थी। और वो धीरे-धीरे


स्क्रीन के अंदर से बाहर आने की कोशिश कर रही थी। जैसे काँच के पीछे से धक्का दे रही हो। तीसरी रात… मामा मेरे कमरे में आए। उन्होंने पूछा — “तूने वो वीडियो देखा था ना?” मैं चुप रहा। उन्होंने बस इतना कहा — “जिसने भी देखा है… वो बचा नहीं है।” मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसके बाद मैंने वो सीडी वापस उसी डिब्बे में रख दी। मामा ने उसे फिर से बंद कर दिया… और इस बार उस पर ताला भी लगा दिया। लेकिन बात


यहाँ खत्म नहीं हुई। क्योंकि अब… वो वीडियो मेरे पास नहीं था… फिर भी… मैं हर रात उसे देख रहा था। बिना चलाए। बिना टीवी के। अब भी कभी-कभी… जब मैं रात को अकेला होता हूँ… मुझे अपने पीछे वही आवाज सुनाई देती है — ठक… ठक… ठक… और एक ठंडी साँस… मेरे कान के पास। अगर कभी तुम्हें भी कोई पुरानी सीडी मिले… जिस पर कुछ धुंधला सा लिखा हो… तो उसे चलाने से पहले एक बार जरूर सोच लेना। क्योंकि कुछ चीज़ें… देखने के लिए नहीं होतीं।

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