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यह एक रोंगटे खड़े कर देने वाली काला जादू की सच्ची कहानी (kala jadu true story) है। कुवैत से लौटे पति ने अपनी पत्नी के साथ रात के 3 बजे जो देखा, वह आपके होश उड़ा देगा। पढ़ें भूत प्रेत की सच्ची घटना। रात के ठीक 3 बज रहे थे। मैं कुवैत से पूरे चार साल बाद अपने घर लौटा था। मुझे लगा मेरी पत्नी मेरे पास सो रही है, लेकिन जब मैंने करवट ली, तो बिस्तर खाली था। चादर
रात के 3 बजे का खौफ: Real Horror Story in Hindi | Kala Jadu
यह एक रोंगटे खड़े कर देने वाली काला जादू की सच्ची कहानी (kala jadu true story) है। कुवैत से लौटे पति ने अपनी पत्नी के साथ रात के 3 बजे जो देखा, वह आपके होश उड़ा देगा। पढ़ें भूत प्रेत की सच्ची घटना। रात के ठीक 3 बज रहे थे। मैं कुवैत से पूरे चार साल बाद अपने घर लौटा था। मुझे लगा मेरी पत्नी मेरे पास सो रही है, लेकिन जब मैंने करवट ली, तो बिस्तर खाली था। चादर
पर सिर्फ सिलवटें थीं और वो हिस्सा बिल्कुल बर्फ की तरह ठंडा था, जैसे वहां कोई हफ्तों से सोया ही न हो। मेरी नींद अचानक टूट गई। कमरे में एक अजीब सी घुटन थी, एक ऐसी सड़ांध जो मरे हुए चूहे या सड़े हुए गोश्त से आती है। मैंने कमरे से बाहर झांका तो दालान में हल्का सा अंधेरा था। मैं दबे पांव आंगन की तरफ बढ़ा। और वहां जो मैंने देखा, उसने मेरी रगों में दौड़ते खून को जमा
कर दिया। मेरी पत्नी, मेरी मीना, आंगन के बीचों-बीच उकड़ू बैठी थी। उसके हाथों में कुछ था जिसे वो नोच-नोच कर खा रही थी। जब मैं थोड़ा और करीब गया, तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई—वो कच्चा मांस चबा रही थी और जब उसने मेरी आहट सुनकर सिर घुमाया, तो उसकी आंखें पूरी तरह से सफेद हो चुकी थीं। उनमें कोई पुतली नहीं थी, सिर्फ एक खौफनाक सफेद रंग। मेरा नाम रमेश है। यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है,
बल्कि एक ऐसी real horror story in hindi है, जिसे याद करके आज भी मेरे हाथ-पैर कांपने लगते हैं। इंसान जब परदेस में होता है, तो दिन-रात सिर्फ अपने परिवार के लिए मेहनत करता है। कुवैत की उस झुलसा देने वाली गर्मी में मैंने 12-12 घंटे की शिफ्ट इसलिए की थी ताकि मेरे घरवाले यहां चैन की सांस ले सकें। हर महीने मैं अपनी पूरी पगार घर भेज देता था। मेरा एक छोटा सा परिवार है—मेरी पत्नी मीना और मेरे
बूढ़े मां-बाप। मेरी गैरहाजिरी में मीना ने ही पूरे घर को संभाला था। चार साल बाद जब मुझे छुट्टी मिली, तो मैंने किसी को नहीं बताया। मैं उन्हें सरप्राइज देना चाहता था। जब मैं घर पहुंचा, तो शाम ढल चुकी थी। मुझे देखकर मां रो पड़ीं, बाबूजी ने गले लगा लिया। मीना भी बहुत खुश थी, लेकिन उसकी मुस्कान में मुझे कुछ अजीब लगा। उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था, जैसे शरीर में खून की कमी हो। उसकी आंखों
के नीचे गहरे काले घेरे थे और वो बहुत कमजोर लग रही थी। मैंने सोचा शायद घर के काम की थकान होगी। लेकिन उस रात जब हम सोने गए, तो मुझे पहली बार उस खौफ का एहसास हुआ जो मेरे घर की दीवारों में बस चुका था। रात के करीब 2 बज रहे होंगे। मेरी आंख अचानक खुली। कमरे में बहुत ज्यादा ठंड लग रही थी। मई का महीना था, पंखा चल रहा था, फिर भी मुझे ऐसा लगा जैसे
किसी ने मुझे बर्फ के पानी में डाल दिया हो। मैंने मीना की तरफ देखा, वो मेरी तरफ पीठ करके सो रही थी। तभी मुझे एक बहुत ही धीमी, फुसफुसाती हुई आवाज़ सुनाई दी। कोई बहुत भारी आवाज़ में बोल रहा था, "वो आ गया है... उसे भेजना होगा..."। मैं झटके से उठ बैठा। मैंने पूरे कमरे में देखा, लेकिन वहां मेरे और मीना के अलावा कोई नहीं था। मैंने मीना को हिलाया, "मीना... मीना सुन रही हो? कोई आवाज़
आई क्या?" मीना ने बिना मेरी तरफ घूमे ही जवाब दिया, "सो जाओ, तुम थक गए हो। यहां कोई नहीं है।" उसकी आवाज़... वो मीना की आवाज़ थी, लेकिन उसका लहजा बिल्कुल अलग था। बिल्कुल सपाट, बिना किसी भाव के। मैं उस रात ठीक से सो नहीं पाया। अगले दिन सुबह मैं नहाने के लिए बाथरूम गया। जब मैं तौलिया उठाने के लिए मुड़ा, तो मैंने देखा कि रोशनदान के पास खून के कुछ छींटे पड़े थे। बहुत ताज़ा खून।
मैंने तुरंत मीना को आवाज़ दी। वो दौड़कर आई। मैंने उसे खून के छींटे दिखाए, तो उसने बहुत ही बेरुखी से कहा, "अरे, कोई बिल्ली चूहा मार कर ले आई होगी, मैं साफ कर देती हूं।" उसने इतनी आसानी से ये बात कह दी जैसे ये रोज़ का काम हो। लेकिन मेरा दिमाग सुन्न था, क्योंकि वो रोशनदान इतनी ऊंचाई पर था कि वहां कोई बिल्ली किसी शिकार को लेकर नहीं जा सकती थी। और वो खून के छींटे ऐसे
थे जैसे किसी ने वहां खड़े होकर खून थूका हो। धीरे-धीरे घर का माहौल मुझे काटने को दौड़ने लगा। दिन के उजाले में सब नॉर्मल लगता, लेकिन सूरज ढलते ही घर में एक अजीब सी मनहूसियत छा जाती। मेरी मां ने बातों-बातों में मुझे बताया कि पिछले कुछ महीनों से मीना बहुत चिड़चिड़ी हो गई है। वो कई बार रात-रात भर जागती है और अगर कोई उससे कुछ पूछे तो वो ऐसी नज़रों से घूरती है जैसे कच्चा चबा जाएगी।
मां की बातें सुनकर मुझे लगा कि शायद मेरे दूर रहने से मीना डिप्रेशन में चली गई है। मैंने सोचा कि उसे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाऊंगा। मुझे नहीं पता था कि ये बीमारी किसी डॉक्टर की दवा से नहीं, बल्कि किसी तांत्रिक के मंत्रों से ठीक होने वाली थी। लोग अक्सर bhoot pret ki sachi ghatna पर तब तक यकीन नहीं करते, जब तक वो खुद उस खौफ का सामना न कर लें। और मैं उसी खौफ के मुहाने
पर खड़ा था। ये मेरी वापसी का तीसरा दिन था। रात का खाना खाने के बाद हम सब सो गए थे। और फिर वही हुआ, जिसका जिक्र मैंने शुरुआत में किया था। रात के 3 बजे। मैं आंगन में खड़ा था और मेरी पत्नी कच्चा मांस चबा रही थी। मेरी सांसें मेरे गले में अटक गई थीं। मेरे पैर ज़मीन से चिपक गए थे, मैं चाह कर भी एक कदम पीछे नहीं हटा पा रहा था। एक पल के लिए
मुझे लगा कि मैं कोई बुरा सपना देख रहा हूं। लेकिन हवा में तैरती वो सड़े हुए खून की बदबू बिल्कुल असली थी। "मी... मीना..." मेरे मुंह से मुश्किल से ये शब्द निकले। वो अचानक रुक गई। उसने अपने मुंह से मांस का वो लोथड़ा निकाला। उसके होंठों से खून टपक रहा था। उसने बहुत धीरे-धीरे अपनी गर्दन मेरी तरफ घुमाई। वो गर्दन इतनी ज्यादा घूम गई थी, जितनी किसी आम इंसान की नहीं घूम सकती। उसकी सफेद आंखों में
मुझे देखकर जो भाव था, वो मीना का नहीं था। तभी वो मुस्कुराई। उसकी मुस्कान इतनी चौड़ी थी कि उसके गालों की नसें खिंच गई थीं। और फिर उसने बोलना शुरू किया। लेकिन जो आवाज़ उसके गले से निकली, वो किसी औरत की नहीं, बल्कि एक भारी, खुरदरी और भयानक मर्द की आवाज़ थी। "तू बहुत जल्दी आ गया रमेश... मैंने तो सोचा था कि तेरी लाश ही कुवैत से आएगी..." वो आवाज़ सुनकर मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया।
उसने मेरा नाम लिया था। उसे कैसे पता था कि मैं रमेश हूं? और वो कौन था जो मेरी पत्नी के शरीर के अंदर बैठकर मुझसे बात कर रहा था? इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, वो अचानक चारों पंजों (हाथ और पैर) के बल किसी खूंखार जानवर की तरह खड़ी हो गई। उसकी सफेद आंखें सीधे मुझे घूर रही थीं और अगले ही पल, वो एक भयानक चीख मारते हुए मेरी तरफ झपटी! उस भयानक रात, जब मेरी
पत्नी मीना सफेद आंखों और एक खुरदरी मर्दानी आवाज़ के साथ मुझ पर झपटी, तो मेरी रगों में खून जम गया था। मैं डर के मारे पीछे की तरफ गिरा और मेरा सिर दालान के एक खंभे से जोर से टकराया। मुझे लगा कि आज मेरी मौत तय है, वो मुझे कच्चा चबा जाएगी। लेकिन जैसे ही वो मेरे ऊपर गिरी, मेरे गले में पहना हुआ हनुमान जी का लॉकेट उसकी छाती से छुआ। लॉकेट के छूते ही एक ऐसी
आवाज़ आई जैसे किसी ने खौलते हुए तेल में पानी की बूंदें डाल दी हों। मीना के मुंह से एक दर्दनाक, भेदी चीख निकली जो किसी इंसान की नहीं हो सकती थी। वो चीख इतनी तेज़ थी कि खिड़कियों के कांच तक झनझना गए। वो झटके से पीछे हटी और हवा में किसी सूखे पत्ते की तरह उछलकर दूर जा गिरी। चीख सुनकर मेरे बाबूजी और मां अपने कमरे से हड़बड़ाकर बाहर आ गए। उन्होंने लाइट जलाई। मैंने देखा कि
मीना फर्श पर बेहोश पड़ी थी। उसके मुंह से झाग निकल रहा था और उसके होंठों पर अभी भी उस कच्चे मांस का खून लगा हुआ था। मां उसे देखकर जोर-जोर से रोने लगीं। बाबूजी ने कांपते हाथों से पानी का गिलास लाकर मीना के चेहरे पर छींटे मारे। मैंने किसी तरह खुद को संभाला और उस कच्चे मांस के टुकड़े को वहां से हटाकर दूर फेंक दिया। मैं नहीं चाहता था कि मेरे बूढ़े मां-बाप उसे देखकर और ज्यादा
डर जाएं। उस रात के बाद मुझे समझ आ गया था कि जिसे मैं इंटरनेट पर spine chilling ghost stories समझ कर अनदेखा कर देता था, आज वही खौफ मेरे अपने घर में नंगा नाच कर रहा था। अगली सुबह जब मीना को होश आया, तो वो बिल्कुल नॉर्मल थी। उसे रात की कोई बात याद नहीं थी। वो बस इतना कह रही थी कि उसके पूरे शरीर में, खासकर जोड़ों में, भयानक दर्द हो रहा है और उसे बहुत
कमजोरी लग रही है। जब मैंने उसकी छाती पर देखा, तो वहां एक जला हुआ निशान था—ठीक उसी जगह जहां मेरा लॉकेट उससे छुआ था। मेरा दिल खौफ से भर गया। मैं अपनी ही पत्नी के पास जाने से डरने लगा था। दोपहर के वक्त, जब मीना सो रही थी, मैंने अपने बाबूजी को रात का पूरा सच बताया। मैंने उन्हें बताया कि कैसे मीना कच्चा मांस खा रही थी और कैसे उसने किसी मर्द की आवाज़ में बात की।
बाबूजी की आंखें फटी रह गईं। उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। उन्होंने गहरी सांस ली और जो बताया, उसने मेरे पैरों तले ज़मीन खिसका दी। बाबूजी ने बताया कि मेरे कुवैत जाने के बाद, मेरा सगा चाचा—जो हमेशा मेरी तरक्की और मेरी परदेस की कमाई से जलता था—अक्सर हमारे घर आने लगा था। कुछ महीने पहले, अमावस्या की रात के आस-पास, मीना ने चाचा को घर के पिछले हिस्से में कुछ गाड़ते हुए देखा था। जब मीना
ने टोका, तो चाचा ने बहाना बना दिया कि वो किसी पौधे की खाद डाल रहा है। उसके कुछ ही दिनों बाद से मीना की तबीयत खराब रहने लगी और घर में अजीबोगरीब चीज़ें होने लगीं। कभी रसोई का सारा दूध अचानक फट कर काला हो जाता, तो कभी घर के मंदिर में रखी भगवान की मूर्तियां अपने आप पीठ फेर लेतीं। मुझे अब सब कुछ शीशे की तरह साफ दिखाई दे रहा था। यह कोई दिमागी बीमारी नहीं थी,
यह एक kala jadu true story थी। किसी ने मेरी मेहनत की कमाई और मेरे हंसते-खेलते परिवार की खुशियों को श्मशान की राख में मिलाने का इंतजाम कर दिया था। हम तुरंत घर के पिछले हिस्से में गए, जहां बाबूजी ने चाचा को कुछ गाड़ते हुए देखने का ज़िक्र किया था। वहां एक पुराना नीम का पेड़ था। हमने फावड़ा लिया और पेड़ के आस-पास की मिट्टी खोदने लगे। मेरी धड़कनें बहुत तेज़ थीं। हाथ कांप रहे थे। अचानक फावड़ा
किसी सख्त चीज़ से टकराया। हमने मिट्टी हटाई तो वहां एक छोटी सी मिट्टी की मटकी दबी हुई मिली। उस मटकी का मुंह लाल कपड़े और काले धागे से बांधा गया था। जैसे ही मैंने उस मटकी को बाहर निकाला, उसमें से सड़े हुए मांस और गंदे नाले जैसी भयानक बदबू आई। बाबूजी ने कांपते हाथों से उस लाल कपड़े को खोला। मटकी के अंदर का नज़ारा देखकर मुझे उल्टी आ गई। उसमें एक सुअर की खोपड़ी, कुछ इंसानी बाल,
सिंदूर से रंगे हुए नींबू, लोहे की जंग लगी कीलें और मीना के कपड़े का एक टुकड़ा रखा था। साथ में एक भोजपत्र था जिस पर उल्टे-सीधे मंत्र और मेरा नाम—'रमेश'—लाल रंग (शायद खून) से लिखा हुआ था। यह एक bhoot pret ki sachi ghatna का जीता-जागता और खौफनाक सबूत था। किसी अघोरी या तांत्रिक से एक बहुत ही गंदा और खतरनाक इल्म (काला जादू) करवाया गया था, जिसका मकसद मेरे परिवार को बर्बाद करना और मीना के शरीर पर
एक शैतानी रूह का कब्ज़ा करवाना था। हमने उस मटकी को ले जाकर गांव के बाहर बहती नदी में फेंक दिया। मुझे लगा कि शायद ऐसा करने से वो बुरी शक्ति खत्म हो जाएगी और मेरा घर फिर से शांत हो जाएगा। लेकिन मैं गलत था। बहुत गलत। मैंने उस शैतान को छेड़ कर एक बहुत बड़ी गलती कर दी थी। उसी रात, घर का माहौल पूरी तरह से बदल गया। हवा में एक अजीब सी भारीपन आ गई थी।
रात के करीब 1 बजे होंगे। मैं और मीना अपने कमरे में थे। मीना गहरी नींद में थी। तभी अचानक घर की बिजली कट गई। चारो तरफ घुप्प अंधेरा छा गया। बाहर कुत्ते एक अजीब और दर्दनाक आवाज़ में रोने लगे। मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई। तभी मुझे अपने कमरे की छत से खुरचने की आवाज़ आने लगी। खुर्र... खुर्र... खुर्र... जैसे कोई लंबे और पैने नाखूनों से छत को खुरच रहा हो। मैंने ऊपर देखा, कुछ नहीं था। तभी
मेरी नज़र बिस्तर पर पड़ी। बिस्तर खाली था। मीना वहां नहीं थी। मेरे पूरे शरीर में डर की लहर दौड़ गई। "मीना!" मैंने आवाज़ दी। कोई जवाब नहीं। मैंने टॉर्च की रोशनी कमरे के हर कोने में घुमाई। वो कहीं नहीं थी। तभी मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा है। किसी की ठंडी, बदबूदार सांसें मेरी गर्दन को छू रही थीं। मैं झटके से मुड़ा। वहां मीना खड़ी थी, लेकिन वो हवा में जमीन से लगभग एक
फुट ऊपर तैर रही थी! उसके बाल उसके चेहरे पर बिखरे हुए थे और उसकी गर्दन एक अजीब से कोण (angle) पर मुड़ी हुई थी। हड्डियों के चटकने की 'कड़क-कड़क' आवाज़ आ रही थी, जैसे उसके शरीर की एक-एक हड्डी टूट कर दोबारा जुड़ रही हो। उसने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आंखें फिर से पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं, और इस बार उसकी आंखों से खून के आंसू बह रहे थे। "तूने मेरी जगह छीनने की कोशिश
की... अब मैं तेरी जान लूंगा!" वो फिर से उसी खुरदरी, भारी मर्दानी आवाज़ में बोली। इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता, किसी अदृश्य शक्ति ने मुझे हवा में उठाया और जोर से दीवार पर दे मारा। मेरे मुंह से खून निकल आया। मेरे मोबाइल की टॉर्च दूर छिटक कर गिर गई थी। उस हल्की रोशनी में मैंने जो देखा, वो किसी भी real horror story in hindi से ज्यादा भयानक था। मीना अब दीवार पर छिपकली की तरह
रेंग रही थी। उसके हाथ-पैर उल्टे मुड़ चुके थे। वो दीवार पर रेंगती हुई सीधे छत पर पहुंच गई और मुझे घूरने लगी। "आज रात तेरे बाबूजी नहीं बचेंगे रमेश... खून चाहिए मुझे... खून!" वो शैतान छत से फुसफुसाया और एक भयानक हंसी के साथ मेरे मां-बापू के कमरे की तरफ जाने वाले वेंटिलेटर (रोशनदान) में एक रबर की तरह सिकुड़ कर घुसने लगी। मुझे दर्द की परवाह नहीं थी। मेरे मां-बाबूजी की जान खतरे में थी। मैं उठा और
दौड़कर उनके कमरे की तरफ भागा। लेकिन उनके कमरे का दरवाज़ा अंदर से नहीं, बल्कि बाहर से किसी अनदेखी ताकत ने लॉक कर दिया था। अंदर से मेरी मां की दिल दहला देने वाली चीखें आ रही थीं! अंदर से मेरी मां की दिल दहला देने वाली चीखें आ रही थीं और मैं बाहर पागलों की तरह दरवाज़ा पीट रहा था। मेरे कंधे में भयंकर दर्द था, लेकिन उस वक्त मेरे लिए मेरे मां-बापू की जान से बढ़कर कुछ नहीं
था। अंदर से चीज़ों के टूटने और बाबूजी के कराहने की आवाज़ें आ रही थीं। मैंने आस-पास देखा, आंगन में एक भारी लोहे का सब्बल (रॉड) पड़ा था। मैंने उसे उठाया और पूरी ताकत से दरवाज़े के कुंडे पर दे मारा। दो-तीन बार पूरी जान लगाकर मारने के बाद, लकड़ी का वो पुराना दरवाज़ा एक जोरदार 'कड़क' की आवाज़ के साथ टूट गया। दरवाज़ा खुलते ही अंदर से जो बदबू का भभका आया, उसने मेरी सांसें रोक दीं। यह बदबू
श्मशान की राख और सड़े हुए खून की थी। कमरे में घुप्प अंधेरा था। मैंने अपना टूटा हुआ फोन उठाया, जिसकी टॉर्च अभी भी टिमटिमा रही थी, और उसकी रोशनी अंदर फेंकी। सामने जो नज़ारा था, उसे देखकर मेरी रूह कांप गई। कोई भी इंसान अगर इंटरनेट पर bhoot pret ki sachi ghatna पढ़ता है, तो उसे लगता है कि ये सब सिर्फ कहानियां हैं, लेकिन जब खौफ आपके सामने खड़ा हो, तो मौत भी आसान लगने लगती है। मेरी
मां कमरे के एक कोने में बेहोश पड़ी थीं, उनके माथे से खून रिस रहा था। और बिस्तर पर... बिस्तर पर बाबूजी पड़े थे और मीना उनकी छाती पर बैठी थी। उसके दोनों हाथ बाबूजी के गले पर थे। बाबूजी की आंखें बाहर आ गई थीं और वो हवा में अपने पैर छटपटा रहे थे। मीना की सफेद आंखें लाल हो चुकी थीं और वो उसी खुरदरी मर्दानी आवाज़ में हंस रही थी। "इसे तो मैं अपने साथ जहन्नुम ले
जाऊंगा!" उस शैतान ने फुंकारते हुए कहा। मेरे पास सोचने का समय नहीं था। मुझे याद आया कि मेरा हनुमान जी का लॉकेट कैसे उस शैतान को जलाता है। मैंने तुरंत अपने गले से वो लॉकेट तोड़ा, उसे अपनी मुट्ठी में कसा और दौड़कर मीना के बालों को पीछे से पकड़ लिया। मैंने वो लॉकेट वाली मुट्ठी सीधा उसकी नंगी पीठ पर रख दी। लॉकेट के छपते ही एक भयानक 'छन्न' की आवाज़ आई, जैसे जलते हुए तवे पर किसी
ने बर्फ रख दी हो। मीना के मुंह से एक ऐसी गगनभेदी चीख निकली जिससे मेरे कान सुन्न पड़ गए। वो झटके से बाबूजी के ऊपर से हटी और मुझे हवा में धकेलते हुए दूर जा गिरी। वो ज़मीन पर किसी मछली की तरह तड़पने लगी और उसके मुंह से काला झाग निकलने लगा। कुछ सेकंड तड़पने के बाद वो शांत हो गई और बेहोश हो गई। बाबूजी बुरी तरह हांफ रहे थे। मैंने तुरंत मां को उठाया, उनके चेहरे
पर पानी डाला। वो होश में आईं तो फूट-फूट कर रोने लगीं। हम समझ चुके थे कि अब यह बात हमारे बस की नहीं रही। यह एक kala jadu true story का वो खौफनाक मोड़ था जहां इंसानियत हार जाती है और शैतानी ताकतें हावी हो जाती हैं। हमने मीना के हाथ-पैर मोटे रस्सों से चारपाई से बांध दिए। सुबह होने तक हम तीनों उसी कमरे में हाथ में लोहे की रॉड और हनुमान चालीसा लिए बैठे रहे। जैसे ही
सूरज की पहली किरण निकली, बाबूजी गांव के सबसे पुराने शिव मंदिर गए और वहां से 'भैरव बाबा' को लेकर आए। भैरव बाबा एक सिद्ध तांत्रिक थे, जो ऐसी रूहानी और शैतानी ताकतों से लड़ने के लिए पूरे इलाके में जाने जाते थे। जब भैरव बाबा ने हमारे घर की चौखट पर कदम रखा, तो उनके माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उन्होंने कहा, "घर में मौत का साया है। किसी ने श्मशान की सबसे भूखी और गंदी चुड़ैल को तुम्हारे
घर में छोड़ा है। तुमने जो मटकी नदी में फेंकी थी, उसने उस शैतान को आज़ाद कर दिया है। आज रात हमें अनुष्ठान करना होगा, वरना ये औरत (मीना) कल का सूरज नहीं देख पाएगी।" बाबा की बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। यह कोई आम hindi ghost story नहीं थी, मेरी पत्नी की जान दांव पर थी। दिन भर बाबा ने घर के आंगन में एक बड़ा सा हवन कुंड बनाया। उन्होंने पूरे घर के चारों ओर लोहे
की कीलें गाड़ दीं ताकि वो शैतानी रूह घर से बाहर न भाग सके। रात के 11 बजे बाबा ने हवन शुरू किया। उन्होंने मीना को, जो अभी भी रस्सियों से बंधी हुई थी, हवन कुंड के सामने लिटा दिया। जैसे ही बाबा ने मंत्र पढ़ने शुरू किए और हवन में आहुति डाली, घर का तापमान अचानक शून्य से नीचे चला गया। मई की गर्मी में हमारे मुंह से भाप निकलने लगी। अचानक मीना की आंखें खुलीं। वो सफेद आंखें!
वो रस्सियों को तोड़ने की कोशिश करने लगी। चारपाई हवा में उठने लगी थी। "मुझे छोड़ दे बुड्ढे! मैं इन सबको खा जाऊंगा! इस घर का एक-एक कतरा मेरा है!" मीना के शरीर से वो भयानक आवाज़ गूंजी। बाबा ने बिना डरे अपने कमंडल से पवित्र जल निकाला और जोर से मीना के चेहरे पर मारा। जल पड़ते ही मीना के चेहरे से धुआं निकलने लगा। "किसने भेजा है तुझे? नाम बता!" बाबा ने अपनी भारी आवाज़ में आदेश दिया।
"मैं नहीं बताऊंगा... मैं खून पीऊंगा!" शैतान ने चीखते हुए कहा और मीना की गर्दन इतनी जोर से घूमी कि मुझे लगा उसकी हड्डियां टूट जाएंगी। तभी बाबा ने आग में से एक जलता हुआ कोयला निकाला और चिमटे से पकड़कर मीना के पैरों के पास रखा। "नाम बता, वरना तुझे इसी आग में भस्म कर दूंगा!" बाबा का मंत्रोच्चार बहुत तेज़ हो गया था। हवा इतनी तेज़ चलने लगी थी कि लगा घर की छत उड़ जाएगी। आंगन में
रखा सारा सामान इधर-उधर उड़ने लगा। मेरी मां डर के मारे बाबूजी के सीने से लगी रो रही थीं। मैं बस अपनी मीना को उस दर्द से तड़पते हुए देख रहा था, और खुद को कोस रहा था। अचानक वो शैतान हार मानने लगा। मीना का शरीर बुरी तरह कांपने लगा और उसी भयानक आवाज़ में वो चिल्लाया, "सुमेर... सुमेर ने भेजा है मुझे! उसने मुझे श्मशान की राख और खून दिया था। उसने कहा था रमेश का घर बर्बाद
कर दो!" सुमेर! ये मेरे उसी चाचा का नाम था जिसने अपनी जलन और लालच में आकर मेरे परिवार पर ये मौत का खेल रचा था। जैसे ही शैतान ने नाम लिया, बाबा ने एक पीली सरसों मुट्ठी में ली, उस पर कुछ पढ़ा और पूरी ताकत से मीना की छाती पर मार दिया। मीना का शरीर हवा में एक झटके से उठा, उसका मुंह खुला और उसके मुंह से गाढ़ा, बदबूदार काला खून और कुछ लोहे की जंग लगी
कीलें उल्टी के रूप में बाहर आ गिरीं। उसके तुरंत बाद एक काली सी धुएं की लकीर उसके मुंह से निकली, जो चीखती हुई हवन कुंड की आग में जा गिरी। आग की लपटें एकदम से लाल और नीली हो गईं और फिर सब शांत हो गया। हवा रुक गई। वो सड़ांध वाली बदबू अचानक गायब हो गई। मीना के शरीर से वो सफेद आंखें हट चुकी थीं और वो बेहोश होकर चारपाई पर गिर पड़ी। बाबा ने पसीना पोंछते
हुए कहा, "बेटा, शैतान जल चुका है। तुम्हारी पत्नी अब सुरक्षित है। लेकिन जिसने ये गंदा काम करवाया था, उसका अंत अब बहुत बुरा होगा। जब किया-कराया पलटता है, तो वो भेजने वाले की जान लेकर ही शांत होता है।" बाबा की बात सौ प्रतिशत सच साबित हुई। अगली सुबह हमें खबर मिली कि मेरा चाचा सुमेर रात को अपने बिस्तर पर लकवाग्रस्त (paralyzed) हो गया है। जब लोग उसके कमरे में गए, तो उसकी आंखें फटी की फटी थीं
और उसके मुंह से झाग निकल रहा था। वो ना कुछ बोल पा रहा था, ना हिल पा रहा था। उसकी हालत देखकर हर कोई कांप गया। उसे उसके अपने किए की सजा मिल चुकी थी। आज इस घटना को हुए एक साल से ज्यादा हो चुका है। मैंने वो गांव वाला घर बेच दिया और अब हम सब शहर में एक छोटा सा घर लेकर रहते हैं। मीना अब बिल्कुल ठीक है, लेकिन आज भी जब रात के 3
बजते हैं, तो मेरी आंख अपने आप खुल जाती है। मैं आज भी यह देखने के लिए मीना की तरफ ज़रूर देखता हूं कि कहीं उसकी आंखें सफेद तो नहीं हो गईं... यह मेरी ज़िंदगी का वो खौफनाक सच है जिसने मुझे सिखा दिया कि कभी-कभी अपनों के रूप में ही सबसे बड़े शैतान छुपे होते हैं। जो लोग spine chilling ghost stories ढूंढते हैं, उन्हें मैं बस यही कहूंगा—अंधेरे से मत डरना, डरना उन लोगों से जो उजाले में
तुम्हारे साथ चलते हैं।

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