प्यार या धोखा? मीरा के अतीत की Best Emotional Story in Hindi
अर्जुन ने वह पुरानी डायरी ज़मीन पर फेंक दी। उसके पन्नों के बीच दबी एक धुंधली सी तस्वीर मीरा के पैरों के पास आकर गिरी। मीरा का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया था। अर्जुन की आँखों में वह प्यार नहीं था जो सुबह तक था, वहाँ सिर्फ एक चुभता हुआ सवाल और नफरत की एक तीखी लहर थी। 'क्या यह सब एक नाटक था मीरा? क्या हमारी हर मुलाकात, हर वादा और हर वो रात जो हमने साथ बिताई, बस उस सच को छिपाने का एक ज़रिया थी?' मीरा के पास शब्द थे, मगर बोलने की हिम्मत नहीं। उसका अतीत उसके सामने एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा हो गया था और उसे पता था कि आज उसकी खामोशी ही उसका सबसे बड़ा गुनाह बन चुकी है।"
शहर की बारिश हमेशा खुशनुमा नहीं होती, कभी-कभी यह पुराने ज़ख्मों को हरा करने का बहाना भी बन जाती है। अर्जुन अपनी बालकनी में खड़ा बाहर गिरती बूंदों को देख रहा था, लेकिन उसका ध्यान बाहर के सुहाने मौसम पर नहीं बल्कि कमरे के अंदर बैठी मीरा पर था। मीरा, जो पिछले दो सालों से उसकी दुनिया का केंद्र बनी हुई थी। उनकी प्रेम कहानी किसी फिल्म की तरह शुरू हुई थी—एक छोटे से
कैफे में हुई मुलाकात, फिर घंटों तक फोन पर होने वाली बातें और फिर एक-दूसरे के बिना एक पल भी न रह पाने की वो तड़प। लोगों के लिए वे एक 'परफेक्ट कपल' थे, लेकिन अर्जुन को अब महसूस हो रहा था कि उस परफेक्शन के पीछे कुछ ऐसा है जिसे वह आज तक छू नहीं पाया है। अर्जुन पेशे से एक आर्किटेक्ट था। उसका स्वभाव थोड़ा जिद्दी था और उसे चीज़ें अपने हिसाब से व्यवस्थित पसंद थीं। वह रिश्तों में भी पारदर्शिता का हिमायती था। वहीं मीरा एक कहानीकार थी, जो शब्दों से जादू बुनती थी। उसकी बातों में
एक अजीब सा ठहराव था, एक ऐसी शांति जो अर्जुन के तेज़ मिज़ाज को शांत कर देती थी। लेकिन आज वही शांति अर्जुन को खटक रही थी। उसे लग रहा था कि मीरा की इस चुप्पी के पीछे कोई ऐसा अंधेरा कमरा है जिसकी चाबी उसके पास नहीं है। वह अक्सर देखता था कि मीरा लिखते-लिखते अचानक कहीं खो जाती है और उसकी आँखों में एक ऐसा दर्द उभर आता है जिसे वह चाहकर भी साझा नहीं करती। "तुम फिर से वही तस्वीर देख रही हो मीरा?" अर्जुन ने बिना पीछे मुड़े पूछा। उसके स्वर में एक हल्की सी कड़वाहट
थी जो साफ महसूस की जा सकती थी। मीरा ने हड़बड़ाकर टेबल पर रखा फ्रेम उल्टा कर दिया। "नहीं अर्जुन, बस कुछ पुराने ख्याल आ गए थे। तुम बताओ, कॉफी पियोगे?" उसने बात बदलने की कोशिश की, जो उसकी पुरानी आदत थी। अर्जुन मुड़ा और सीधे मीरा की आँखों में झांका। मीरा ने हमेशा की तरह अपनी नज़रें चुरा लीं। यही वह बिंदु था जहाँ उनके बीच का टकराव शुरू होता था। अर्जुन का मानना था कि प्यार में कोई पर्दा नहीं होना चाहिए, जबकि मीरा का अहं उसे यह इजाज़त नहीं देता था कि वह अपनी कमज़ोरियों को किसी
के सामने ज़ाहिर करे, चाहे वह अर्जुन ही क्यों न हो। उसे डर था कि अगर उसने अपना सच बताया, तो शायद अर्जुन उसे उस नज़िए से कभी नहीं देख पाएगा जिससे वह आज देखता है। उनकी कहानी की शुरुआत जितनी खूबसूरत थी, दरारें उतनी ही खामोश थीं। अर्जुन को याद आया कि कैसे वह पहली बार शिमला की एक सर्द शाम को मीरा से मिला था। अर्जुन वहाँ एक नए प्रोजेक्ट के सिलसिले में गया था और मीरा अपने नए उपन्यास के लिए सुकून ढूँढ रही थी। जब पहली बार उनकी नज़रें मिली थीं, तो ऐसा लगा था जैसे
कोई पुराना अधूरा रिश्ता फिर से जुड़ने जा रहा हो। अर्जुन को मीरा का वह सादगी भरा अंदाज़ और हर बात को तर्क के साथ कहना बहुत पसंद आया था। लेकिन वही तर्क अब उनके बीच की दूरियों की वजह बन रहा था। मीरा अक्सर कहती थी कि हर इंसान का एक अतीत होता है और उसे कुरेदना ठीक नहीं, लेकिन अर्जुन के लिए वह 'अतीत' अब एक रहस्य बन चुका था। एक दिन अर्जुन को मीरा के पुराने सामान को व्यवस्थित करते समय एक संदूक मिला। उसमें एक पुरानी डायरी और कुछ खत थे। उन खतों पर 'रोहन' नाम
के किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर थे। उन खतों में लिखी बातें सिर्फ प्रेम पत्र नहीं थीं, उनमें एक अजीब सा डर और बेबसी छिपी थी। जब अर्जुन ने इस बारे में मीरा से पूछना चाहा, तो उसने उसे बुरी तरह झिड़क दिया। "यह मेरी निजी ज़िंदगी का हिस्सा है अर्जुन, तुम बिना पूछे मेरा सामान कैसे छू सकते हो?" मीरा का यह सख्त लहजा अर्जुन को चुभ गया। उसका पुरुषोचित अहंकार जाग गया था। उसे लगा कि मीरा उससे कुछ बहुत बड़ा छिपा रही है। अधूरा सच हमेशा पूरे झूठ से ज़्यादा खतरनाक होता है। अर्जुन का शक अब गहराने
लगा था। उसे लगने लगा कि मीरा शायद अभी भी उस रोहन को भूल नहीं पाई है। मीरा का व्यवहार भी अब बदलने लगा था। वह रातों को उठकर बालकनी में घंटों बैठी रहती और अकेले में बुदबुदाती। अर्जुन को महसूस होता कि उनके बिस्तर के बीच एक ऐसी अदृश्य दीवार खड़ी हो गई है जिसे पार करना उसके बस में नहीं था। वह अक्सर सोचता कि क्या वह मीरा को सच में जानता है? या वह सिर्फ उस मीरा को जानता है जो वह उसे दिखाना चाहती है? उनकी तीसरी सालगिरह से कुछ दिन पहले की बात है। अर्जुन
ने तय किया कि वह इस राज की तह तक जाकर ही दम लेगा। उसने मीरा के उस पुराने घर जाने का फैसला किया जहाँ वह अर्जुन से मिलने से पहले रहती थी। मीरा को लगा कि अर्जुन ऑफिस के काम से शहर से बाहर जा रहा है, लेकिन अर्जुन उन तंग गलियों में उस सच को तलाश रहा था जिसे मीरा ने मिट्टी में दफन कर दिया था। वहाँ के पुराने मोहल्ले में उसे जो पता चला, उसने अर्जुन की रूह कंपा दी। मीरा सिर्फ एक साधारण लड़की नहीं थी, उसका नाम एक ऐसे हादसे से जुड़ा था जिसके
बारे में सुनकर आज भी लोग कांप जाते थे। अर्जुन जब वापस लौटा, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी वीरानी थी। उसके हाथ में वह पुरानी फाइल थी जिसे वह शहर के रिकॉर्ड रूम से निकलवा कर लाया था। मीरा ने जैसे ही उसे देखा, उसके हाथ से पानी का गिलास छूटकर फर्श पर बिखर गया। टूटे हुए काँच के टुकड़ों की तरह ही उनका रिश्ता भी उस पल बिखरने को तैयार था। "तो यह है तुम्हारा वह 'निजी' हिस्सा मीरा?" अर्जुन ने धीमी लेकिन भारी आवाज़ में पूछा। "तुमने मुझसे कहा था कि तुम्हारे माँ-बाप एक एक्सीडेंट में
गुज़र गए थे, लेकिन इस फाइल में तो कुछ और ही लिखा है। इसमें लिखा है कि उस रात घर में तुम भी मौजूद थी और तुमने..." "चुप हो जाओ अर्जुन!" मीरा चिल्लाई। उसकी आवाज़ में वो दर्द था जो सालों से दबा हुआ था। "तुम्हें क्या लगा? तुम चंद कागज़ पढ़कर मेरा सच जान जाओगे? तुमने कभी मुझसे पूछने की कोशिश की कि मैंने वह सब क्यों किया? तुमने बस फैसला सुना दिया क्योंकि तुम्हारा इगो हर्ट हुआ है कि मैंने तुम्हें बताया नहीं।" "प्यार में बताया नहीं जाता मीरा, प्यार में तो सब कुछ सामने होता है," अर्जुन
ने मेज़ पर मुक्का मारते हुए कहा। "मैंने तुम्हें अपनी ज़िंदगी का हर हिस्सा दिया, और तुमने मुझे क्या दिया? सिर्फ एक आधा-अधूरा सच। मुझे यह एहसास दिलाया कि मैं तुम्हारे भरोसे के काबिल ही नहीं हूँ।" उनके बीच का यह टकराव अब उस मोड़ पर पहुँच गया था जहाँ से वापसी का रास्ता धुंधला था। मीरा की आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी आग थी जो सब कुछ जला देने पर आमादा थी। उसने अर्जुन की आँखों में आँखें डालकर कहा, "सच जानना चाहते हो न? तो सुनो। लेकिन याद रखना, सच जानने के बाद तुम
कभी भी पहले वाले अर्जुन नहीं रह पाओगे। क्या तुम तैयार हो उस बोझ को उठाने के लिए जो मैं सालों से ढो रही हूँ?" अर्जुन वहीं सोफे पर ढह गया। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मीरा से नफरत करे या उस पर तरस खाए। कमरे में पसरी खामोश चीखें अब और भी तेज़ हो गई थीं। बाहर बारिश और तेज़ हो गई थी, जैसे आसमान भी इस प्रेम कहानी के बिखरने का मातम मना रहा हो। क्या मीरा का वह 'अधूरा सच' उनके 'सच्चे प्यार' पर भारी पड़ेगा? क्या अर्जुन
उस सच को स्वीकार कर पाएगा जिसे वह ढूँढने निकला था? यह तो बस शुरुआत थी उस तूफान की, जो उनकी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला था। मीरा की आँखों में वह चमक नहीं थी जिसे देखकर अर्जुन ने कभी अपनी दुनिया संवारने के सपने देखे थे। आज उन आँखों में एक ऐसा खौफ और कड़वाहट थी जो किसी भी इंसान को भीतर तक झकझोर दे। बाहर बारिश का शोर अब एक डरावनी गूँज में बदल चुका था। अर्जुन का हाथ उस पुरानी फाइल पर कस गया, जैसे वह कागज़ नहीं बल्कि मीरा का गला हो, जिससे वह
सच उगलवाना चाहता था। कमरे की पीली रोशनी में मीरा का साया दीवार पर बहुत बड़ा और डरावना लग रहा था। उसने एक लंबी सांस ली और बोलना शुरू किया। "अर्जुन, तुम्हें लगता है कि तुम बहुत बड़े खोजी हो? तुम्हें लगा कि पुरानी फाइलों और लोगों की बातों से तुम मेरा सच जान लोगे? सच कागज़ों पर नहीं, रूह पर लिखा होता है। जिसे तुम मेरा 'धोखा' कह रहे हो, वह दरअसल मेरी ज़िद थी कि मैं तुम्हें उस नफरत से बचा सकूं जो मैं खुद से करती हूँ।" मीरा ने बताया कि आज से सात साल पहले वह
भी तुम्हारी तरह ज़िंदादिल और बेपरवाह थी। उसकी ज़िंदगी में रोहन नाम का एक लड़का था। रोहन सिर्फ उसका प्रेमी नहीं था, वह उसकी पूरी कायनात था। लेकिन रोहन की फितरत में एक ठहराव नहीं था। वह एक ऐसा जुनून था जो सिर्फ जलना जानता था। एक रात, बिल्कुल ऐसी ही तेज़ बारिश हो रही थी। रोहन नशे में था और ज़िद पर अड़ा था कि वह गाड़ी खुद चलाएगा। मीरा ने उसे रोकने की कोशिश की, उसे मिन्नतें कीं, लेकिन रोहन का अहंकार उसके प्यार से बड़ा था। "उस रात गाड़ी में सिर्फ मैं और रोहन नहीं थे अर्जुन,"
मीरा की आवाज़ कांपने लगी। "पीछे वाली सीट पर मेरे माता-पिता भी बैठे थे। हम शहर से वापस लौट रहे थे। रोहन ने रफ्तार बढ़ा दी, वह अपनी मर्दानगी साबित करना चाहता था। फिर एक मोड़ आया... एक तीखा मोड़। सामने से एक ट्रक आ रहा था। रोहन ने गाड़ी मोड़ने की कोशिश की लेकिन कंट्रोल खो दिया। गाड़ी खाई में गिर गई।" मीरा रुकी, उसके गले में जैसे कुछ फंस गया था। अर्जुन अब भी उसे देख रहा था, लेकिन उसके गुस्से की जगह अब एक अजनबी बेचैनी ने ले ली थी। मीरा ने आगे बताया, "जब मुझे होश
आया, तो मैं गाड़ी से बाहर थी। रोहन ज़ख्मी था लेकिन होश में था। गाड़ी के अंदर मेरे पिता दबे हुए थे। पेट्रोल लीक हो रहा था। रोहन के पास मौका था कि वह मेरे पिता को बचा सके, लेकिन वह डर गया। वह अपनी जान बचाकर भाग निकला और मैं... मैं बस देखती रह गई जब वह गाड़ी धमाके के साथ जल उठी। मेरे माँ-बाप मेरी आँखों के सामने राख हो गए और वह इंसान जिसे मैंने 'सच्चा प्यार' समझा था, वह मुझे उस नर्क में अकेला छोड़ गया।" अर्जुन के हाथ से वह फाइल छूटकर गिर गई। उसे
उम्मीद नहीं थी कि सच इतना भयानक होगा। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई थी। मीरा ने अपने आँसू पोंछे और अर्जुन के करीब आई। "रोहन भागा नहीं था अर्जुन, उसने पुलिस को रिश्वत दी, उसने पूरे हादसे का इल्ज़ाम मुझ पर डलवा दिया कि मैं गाड़ी चला रही थी। उस फाइल में जो तुम देख रहे हो, वह मेरा जुर्म नहीं, बल्कि उस धोखे की कहानी है जिसे मैंने सालों तक ढोया है। मैं जेल गई, मैंने अपमान सहा, और जब मैं बाहर आई तो मैंने खुद से वादा किया कि मैं कभी किसी पर भरोसा नहीं करूँगी। फिर
तुम मिले।" अर्जुन की ज़बान जैसे सिल गई थी। उसका वह अहंकारी स्वभाव, जो अब तक मीरा को गुनहगार मान रहा था, अब खुद को छोटा महसूस करने लगा था। उसे लगा कि उसने मीरा के ज़ख्मों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें और कुरेद दिया है। लेकिन एक बात अब भी उसे खटक रही थी। "तो तुमने मुझे यह सब पहले क्यों नहीं बताया मीरा? क्या तुम्हें मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं था?" मीरा हंसी, पर उस हंसी में सिर्फ ज़हर था। "भरोसा? अर्जुन, जिस दिन मैंने तुम्हें वह रोहन वाला खत दिखाया था, तुमने क्या किया था?
तुमने मुझसे सवाल किए थे, तुमने मुझ पर शक किया था। मुझे पता था कि जिस दिन मैं तुम्हें यह बताऊँगी कि मैं एक 'मुजरिम' रह चुकी हूँ—भले ही बेगुनाह थी—तुम मुझे उसी नज़र से देखोगे जिससे यह दुनिया देखती है। और देखो, तुमने वही किया। तुम मेरे घर गए, तुमने मेरी जासूसी की। तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारा प्यार मेरे अतीत से हार गया।" रिश्तों में दरार जब आती है, तो वह सिर्फ गलतफहमी से नहीं, बल्कि भरोसे की कमी से गहरी होती है। अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हो रहा था, लेकिन उसका इगो अब भी
उसे पूरी तरह झुकने नहीं दे रहा था। उसे लगा कि मीरा ने उसे सच न बताकर उसे एक अजनबी बना दिया। उनके बीच का प्रेम अब एक ऐसी जंग में बदल गया था जहाँ जीत किसी की नहीं होने वाली थी। "मैं तुमसे नफरत नहीं कर सकता मीरा," अर्जुन ने भारी आवाज़ में कहा। "लेकिन मैं उस मीरा को भी स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ जिसने मुझे दो साल तक एक झूठ में रखा। क्या हमारा हर हसीन पल सिर्फ एक ढोंग था? क्या तुमने कभी मुझसे सच में प्यार किया या तुम बस एक सहारा ढूँढ रही
थी?" मीरा के लिए यह सवाल आखिरी कील की तरह था। उसने अर्जुन की ओर देखा और बहुत शांति से कहा, "एक डूबते हुए इंसान को तिनके का सहारा नहीं, बल्कि सांस की ज़रूरत होती है। तुम मेरी वह सांस थे अर्जुन। लेकिन शायद तुम्हें सिर्फ एक ऐसी लड़की चाहिए थी जिसकी कहानी साफ-सुथरी हो। मेरा अतीत मैला है, और अगर तुम उसे नहीं अपना सकते, तो इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है।" उस रात उनके घर में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी। अर्जुन अपने कमरे में चला
गया और मीरा अपनी पुरानी डायरी के साथ बालकनी में रह गई। प्यार की उस किताब में अब नफरत और शक के नए पन्ने जुड़ चुके थे। अर्जुन पूरी रात सो नहीं पाया। उसे बार-बार मीरा के पिता की वह जलती हुई गाड़ी और रोहन का वह भागता हुआ चेहरा याद आ रहा था। उसे महसूस हुआ कि उसने मीरा को समझने में बहुत बड़ी गलती कर दी है। वह उसे बचाने के बजाय खुद उसकी तकलीफ का कारण बन गया था। सुबह की पहली किरण के साथ ही एक नया तूफान इंतज़ार कर रहा था। अर्जुन ने तय किया
कि वह इस कहानी का अंत इस तरह नहीं होने देगा। लेकिन क्या मीरा उसे एक और मौका देने के लिए तैयार थी? या फिर उस 'अधूरे सच' ने उनके बीच इतनी लंबी लकीर खींच दी थी जिसे पार करना नामुमकिन था? सुबह की पहली किरण जब कमरे में दाखिल हुई, तो वह अपने साथ कोई नई उम्मीद नहीं बल्कि एक भारी सन्नाटा लेकर आई थी। अर्जुन जब सोकर उठा, तो उसका सिर भारी था और दिल में एक अजीब सी बेचैनी। उसने पूरे घर में मीरा को ढूंढा, लेकिन वह कहीं नहीं थी। किचन में रखी कॉफी की मशीन
ठंडी पड़ी थी और बालकनी का दरवाज़ा खुला था, जहाँ रात भर बारिश का पानी अंदर आकर फर्श को गीला कर चुका था। मेज़ पर मीरा की वह पुरानी डायरी रखी थी, जिसे वह अपनी जान से ज़्यादा प्यार करती थी। उसके ऊपर एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा था, जिस पर सिर्फ दो लाइनें लिखी थीं— "सच्चा प्यार अधूरा सच बर्दाश्त कर सकता है अर्जुन, लेकिन शक की बुनियाद पर खड़ा रिश्ता नहीं। मैं उस सच से भाग रही थी जिसने मेरी ज़िंदगी बर्बाद की, लेकिन मुझे नहीं पता था कि तुम भी उसी सच का हिस्सा बनकर मुझे
फिर से वही सज़ा दोगे।" अर्जुन को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर उतार दिया हो। उसका अहंकार, उसकी ज़िद और उसकी जासूसी करने वाली फितरत ने उस औरत को उससे दूर कर दिया था जिसे उसने अपनी दुनिया माना था। वह पागलों की तरह उसे ढूंढने के लिए घर से बाहर निकला। उसने उन तमाम जगहों पर फोन किया जहाँ मीरा जा सकती थी, लेकिन कहीं से कोई खबर नहीं मिली। तीन दिन बीत गए, लेकिन मीरा का कोई सुराग नहीं था। इन तीन दिनों में अर्जुन ने वह सब किया जो उसे बहुत पहले कर
लेना चाहिए था। उसने उस पुरानी फाइल को फिर से पढ़ा, लेकिन इस बार शक की निगाह से नहीं, बल्कि मीरा के दर्द को समझने के लिए। उसने उस वकील से संपर्क किया जिसने मीरा का केस लड़ा था। वहाँ उसे पता चला कि मीरा ने कभी अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए रोहन के खिलाफ कोई सबूत पेश ही नहीं किया था। वकील ने बताया, "वह लड़की हार चुकी थी अर्जुन। उसे लगा कि जिसके लिए उसने दुनिया छोड़ी, जब वही उसे मौत के मुँह में छोड़कर भाग गया, तो अब बेगुनाही साबित करके भी क्या होगा।" अर्जुन की
आँखों से आँसू बहने लगे। उसे अपनी छोटी सोच पर शर्म आ रही थी। वह जिस 'धोखे' की बात कर रहा था, वह दरअसल मीरा का त्याग था। वह चुप रही ताकि रोहन के परिवार की इज़्ज़त बची रहे, क्योंकि वह कभी उनसे प्यार करती थी। अर्जुन ने तय किया कि वह इस कहानी का अंत ऐसे नहीं होने देगा। उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी रोहन को खोजने में। रोहन, जो अब एक बड़ा बिजनेसमैन बन चुका था और अपनी पुरानी पहचान मिटाकर एक नई ज़िंदगी जी रहा था। करीब एक हफ्ते बाद, अर्जुन को खबर मिली कि मीरा
अपने पुराने शहर के उसी अनाथालय में है जहाँ उसने अपनी सज़ा काटने के बाद कुछ समय बिताया था। अर्जुन बिना एक पल गंवाए वहाँ पहुँचा। वहाँ का मंज़र देखकर उसका दिल भर आया। मीरा बच्चों के बीच बैठी उन्हें कहानी सुना रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ में वह खनक नहीं थी, सिर्फ एक गहरा दर्द था। जब मीरा ने अर्जुन को देखा, तो उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। उसने बच्चों को अंदर भेजा और धीरे से उठकर अर्जुन के पास आई। "यहाँ क्यों आए हो अर्जुन? अब तो मेरे पास कोई सच नहीं बचा जिसे तुम ढूंढ
सको।" "मैं सच ढूंढने नहीं आया मीरा, मैं माफी मांगने आया हूँ," अर्जुन ने उसके पैरों के पास बैठते हुए कहा। "मैंने उस दिन तुमसे पूछा था कि क्या हमारा प्यार एक ढोंग था। आज मुझे जवाब मिल गया है। ढोंग मेरा प्यार था, जो एक कागज़ के टुकड़े से डगमगा गया। तुम्हारा प्यार तो वह था जिसने इतना बड़ा बोझ अकेले सहा और फिर भी मुझे मुस्कुराकर गले लगाया।" मीरा की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने खुद को संभाला। "प्यार में माफी नहीं होती अर्जुन, सिर्फ भरोसा होता है। और तुमने वह भरोसा तोड़ दिया। अब हम
फिर से वैसे नहीं हो सकते जैसे पहले थे।" "मुझे पता है मीरा," अर्जुन ने खड़े होते हुए उसकी आँखों में देखा। "मैं यहाँ तुम्हें वापस ले जाने की ज़िद नहीं करूँगा। लेकिन मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूँ।" अर्जुन ने उसे अपना फोन दिया। स्क्रीन पर एक न्यूज़ हेडलाइन थी— "सात साल पुराने हिट एंड रन केस का सच आया सामने, मशहूर उद्योगपति रोहन खन्ना ने कबूला अपना जुर्म।" मीरा दंग रह गई। अर्जुन ने बताया कि उसने रोहन को ढूंढ निकाला और उसे पुलिस के सामने सच बोलने पर मजबूर कर दिया। "मैंने उसे बताया कि अगर उसने
सच नहीं बोला, तो मैं उसकी सारी काली करतूतों का कच्चा चिट्ठा मीडिया को दे दूँगा। वह डर गया। अब तुम दुनिया की नज़रों में मुजरिम नहीं हो मीरा। तुम आज़ाद हो।" मीरा फूट-फूटकर रोने लगी। यह वह आज़ादी थी जिसके लिए वह कभी तड़पी नहीं थी, लेकिन इसके मिलने पर उसका बोझ हल्का हो गया था। अर्जुन ने उसे अपने सीने से लगा लिया। इस बार उनके बीच कोई दीवार नहीं थी, कोई अधूरा सच नहीं था। लेकिन कहानी का ट्विस्ट अभी बाकी था। मीरा ने अर्जुन को खुद से अलग किया और कहा, "शुक्रिया अर्जुन, मेरी खोई हुई
इज़्ज़त मुझे वापस दिलाने के लिए। लेकिन यह सब करने के बाद भी, मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकती। क्योंकि जिस दिन तुमने मुझ पर शक किया, उसी दिन मेरे अंदर की वह मीरा मर गई जो तुमसे प्यार करती थी।" अर्जुन सन्न रह गया। उसे लगा था कि सच सामने आने के बाद सब ठीक हो जाएगा। लेकिन प्यार की कहानी हमेशा "हैप्पी एंडिंग" वाली नहीं होती। मीरा ने आगे कहा, "मैं अब खुद के साथ रहना चाहती हूँ। बिना किसी के सहारे के, बिना किसी के भरोसे के। मुझे खुद को ढूंढना है अर्जुन, और शायद तुम भी
अब खुद को बेहतर समझ पाओगे।" अर्जुन ने मीरा की आँखों में देखा और समझ गया कि उसकी ज़िद आज उसकी सबसे बड़ी हार बन चुकी थी। उसने मीरा का हाथ चूमा और बिना कुछ कहे वहाँ से मुड़ गया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर एक सुकून था कि उसने मीरा को उसका हक दिला दिया था। रास्ते में वापस आते हुए अर्जुन ने अपनी गाड़ी रोकी। बारिश फिर से शुरू हो गई थी। उसने महसूस किया कि सच्ची मोहब्बत सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है, कभी-कभी अपने साथी की खुशी के लिए उसे आज़ाद कर
देना ही सबसे बड़ा प्यार होता है। मीरा और अर्जुन की यह प्रेम कहानी अधूरी होकर भी पूरी थी। गूगल की रैंकिंग और दुनिया की नज़रों में शायद यह एक दुखांत कहानी (tragedy) थी, लेकिन उनके दिलों में यह एक ऐसी दास्तान बन गई थी जो हमेशा के लिए अमर हो गई। मीरा ने अपना उपन्यास पूरा किया और उसका नाम रखा— "अधूरा सच"। उस किताब की पहली प्रति उसने अर्जुन को भेजी, जिसके आखिरी पन्ने पर लिखा था— "कुछ कहानियों का अधूरा रहना ही उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती होती है, क्योंकि पूरा तो सिर्फ वह वहम होता है जिसे
हम सच मान बैठते हैं।" अर्जुन ने वह किताब सीने से लगा ली। उसे अब किसी सच की तलाश नहीं थी। उसने उस अधूरेपन को ही अपनी ज़िंदगी बना लिया था।
.jpg)
Comments
Post a Comment