Hostel Room No. 307 Hindi Horror Story
Hostel Room No. 307
रात के करीब 9 बजे थे जब राहुल पहली बार उस पुराने से हॉस्टल के गेट के सामने खड़ा था। बारिश अभी-अभी रुकी थी… हवा में गीली मिट्टी की खुशबू थी, लेकिन उसके अंदर एक अजीब सा डर भी घुला हुआ था। हॉस्टल बाहर से ही अजीब लग रहा था…
दीवारों पर सीलन, खिड़कियों पर जंग, और कुछ खिड़कियाँ ऐसी थीं जिनमें अंधेरा इतना गहरा था जैसे अंदर कुछ छुपा हो। “यही है तुम्हारा नया घर…” उसने खुद से कहा, लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था। अंदर जाते ही उसे वार्डन मिला — एक बूढ़ा आदमी, जिसकी आँखें अजीब
तरह से थकी हुई लग रही थीं। “नाम?” “राहुल…” “Room 307…” जैसे ही वार्डन ने ये कहा, उसके पीछे बैठे एक लड़के ने हल्के से सिर उठाकर राहुल को देखा… और फिर तुरंत नजरें झुका लीं। राहुल को थोड़ा अजीब लगा। “कोई प्रॉब्लम है क्या सर?” वार्डन कुछ सेकंड चुप
रहा… फिर बोला, “नहीं… बस… देर रात तक जागना मत।” उसकी आवाज़ में एक अजीब सा भार था… जैसे वो कुछ छुपा रहा हो। Room 307 तीसरी मंजिल पर जाते वक्त सीढ़ियाँ चरमराती थीं… हर कदम के साथ ऐसा लगता था जैसे कोई पीछे-पीछे चल रहा हो। जब राहुल 307
के सामने पहुँचा, दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था। अंदर से हल्की सी रोशनी आ रही थी। उसने धीरे से दरवाज़ा खोला… कमरा साधारण था — दो बेड, एक अलमारी, एक टेबल… लेकिन माहौल… बहुत भारी था। जैसे यहाँ बहुत कुछ हुआ हो। अंदर उसका roommate बैठा था — दुबला-पतला,
आँखों के नीचे काले घेरे, और चेहरा ऐसा जैसे कई दिनों से सोया ना हो। “हाय… मैं राहुल।” वो लड़का धीरे से मुस्कुराया, “मैं अमन…” उसकी मुस्कान… अजीब थी। जैसे वो मुस्कुरा तो रहा हो, लेकिन अंदर से डर रहा हो। रात के करीब 1 बजे होंगे। राहुल गहरी नींद
में था… तभी अचानक उसे किसी के धीरे-धीरे रोने की आवाज़ सुनाई दी। “हूँ… हूँ…” उसने आँखें खोलीं। कमरे में अंधेरा था… सिर्फ खिड़की से हल्की चांदनी आ रही थी। आवाज़… अमन के बेड की तरफ से आ रही थी। राहुल उठकर बैठ गया। “अमन…?” उसने धीरे से पुकारा। कोई
जवाब नहीं। रोने की आवाज़ तेज़ हो गई। अब वो साफ सुन पा रहा था — जैसे कोई दर्द में सिसक रहा हो। राहुल धीरे-धीरे उसके पास गया… “अमन, क्या हुआ भाई?” जैसे ही उसने हाथ आगे बढ़ाया… अमन ने अचानक सिर उठाया। उसकी आँखें… पूरी तरह सफेद थीं। राहुल
का दिल जैसे रुक गया। “तुम… क्यों आए हो…” आवाज़… अमन की नहीं थी। वो भारी, खुरदुरी और बिल्कुल अनजान थी। राहुल पीछे हट गया। “अ… अमन… मजाक मत कर…” अचानक अमन जोर-जोर से हँसने लगा। “हा… हा… हा…” वो हँसी… इंसान की नहीं थी। फिर अचानक… सब कुछ शांत।
अमन वापस लेट गया… जैसे कुछ हुआ ही ना हो। राहुल पूरी रात जागता रहा। सुबह सब कुछ normal था। अमन ऐसे behave कर रहा था जैसे कुछ हुआ ही ना हो। “तू ठीक है ना?” राहुल ने पूछा। “हाँ… क्यों?” “कल रात तू रो रहा था…” अमन कुछ सेकंड
चुप रहा… फिर बोला, “तुमने सपना देखा होगा।” उसकी आँखें राहुल से मिल नहीं रही थीं। उस दिन राहुल नीचे कैंटीन गया। वहाँ कुछ लड़के बैठे थे। एक ने पूछा, “तू 307 में रहता है?” राहुल ने हाँ में सिर हिलाया। सब एक-दूसरे को देखने लगे। “भाई… रूम बदलवा ले।”
“क्यों?” “बस… अच्छा नहीं है वो रूम।” “क्या मतलब?” एक लड़का धीरे से बोला, “पिछले साल… वहाँ एक लड़का मर गया था।” राहुल का गला सूख गया। “कैसे?” “कहते हैं… उसने खुद को मार लिया…” “कहते हैं?” राहुल ने पूछा। लड़का धीरे से झुका, “असल में… किसी ने उसे रात
में चिल्लाते सुना था… वो कह रहा था — ‘वो मुझे छोड़ नहीं रहा… वो मेरे अंदर है…’” राहुल के हाथ से चाय का कप छूट गया। उस रात राहुल सोना नहीं चाहता था। लेकिन नींद कब आ गई… उसे पता ही नहीं चला। अचानक… “ठक… ठक… ठक…” दरवाज़े पर
कोई खटखटा रहा था। राहुल की आँख खुली। घड़ी में 3:07 बजे थे। ठक… ठक… “कौन है?” राहुल ने डरते हुए पूछा। कोई जवाब नहीं। वो धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया… और झिरी से बाहर देखा… कॉरिडोर खाली था। लेकिन… उसे लगा जैसे कोई बहुत पास खड़ा है… बस दिखाई
नहीं दे रहा। अचानक… उसके पीछे से आवाज़ आई— “मत खोलना…” राहुल मुड़ा। अमन खड़ा था। लेकिन उसका चेहरा… बिल्कुल सफेद था। “क्यों?” राहुल ने पूछा। अमन धीरे से बोला— “क्योंकि वो अंदर आ जाएगा…” राहुल के रोंगटे खड़े हो गए। अगले दिन राहुल ने वार्डन से बात की। “सर…
307 में पहले क्या हुआ था?” वार्डन ने गुस्से में कहा, “तुम्हें पढ़ाई करनी है या भूतों की कहानी सुननी है?” लेकिन जब राहुल जाने लगा… वार्डन ने धीरे से कहा, “अगर कुछ अजीब लगे… तो उस कमरे में अकेले मत रहना…” उस रात बिजली चली गई। पूरा हॉस्टल अंधेरे
में डूब गया। कमरे में सिर्फ मोमबत्ती जल रही थी। अमन चुपचाप कोने में बैठा था। अचानक उसने खुद से बात करना शुरू कर दिया। “नहीं… मैं नहीं करूँगा…” “छोड़ दो मुझे…” फिर उसकी आवाज़ बदल गई— “तू मेरा है…” राहुल ने डरते हुए पूछा, “अमन… किससे बात कर रहा
है?” अमन ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा… उसकी गर्दन… अस्वाभाविक तरीके से टेढ़ी हो गई। “तुम नहीं समझोगे…” और फिर… मोमबत्ती अपने आप बुझ गई। कमरे में पूरा अंधेरा छा गया। और उसी अंधेरे में… राहुल को महसूस हुआ— कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है। ठंडी साँस… उसके कान के
पास… “अब तुम्हारी बारी है…” राहुल चीख पड़ा। सुबह जब राहुल उठा… अमन गायब था। उसका बिस्तर खाली था। लेकिन दीवार पर… खून से कुछ लिखा था— “307 खाली नहीं है…” राहुल के हाथ कांपने लगे। तभी पीछे से आवाज़ आई— “तुम अब जा नहीं सकते…” राहुल ने धीरे-धीरे मुड़कर
देखा… अमन दरवाज़े के पास खड़ा था… लेकिन इस बार… उसकी आँखें पूरी काली थीं। और वो मुस्कुरा रहा था। राहुल के सामने जो खड़ा था… वो अमन था… लेकिन अब वो अमन नहीं था। उसकी आँखें पूरी काली थीं… जैसे अंदर कुछ भी नहीं बचा हो। चेहरे पर वो
मुस्कान… जो इंसान की नहीं हो सकती। “तुम… अब… जा नहीं सकते…” उसकी आवाज़ दो अलग-अलग आवाज़ों में गूँज रही थी। राहुल पीछे हट गया। “अमन… प्लीज… ये सब बंद कर… क्या हो रहा है ये?” अमन धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा। हर कदम के साथ उसके पैरों की आवाज़
नहीं आ रही थी… जैसे वो जमीन को छू ही नहीं रहा। “मैंने उसे बहुत रोका…” “लेकिन वो… मुझे छोड़ता ही नहीं…” अचानक वो रुक गया… और अपनी गर्दन को झटका दिया। टक… उसकी गर्दन एक अजीब एंगल पर मुड़ गई। राहुल के मुँह से आवाज़ तक नहीं निकली। “कौन
है तू…?” राहुल ने कांपते हुए पूछा। अमन का चेहरा धीरे-धीरे ऊपर उठा… और फिर वो हँसा— “हा… हा… हा…” “मैं… वही हूँ… जो इस कमरे में मर गया था…” राहुल का दिल जैसे धड़कना भूल गया। “नहीं… ये झूठ है…” “झूठ…?” “तो फिर… ये देख…” अचानक राहुल की आँखों
के सामने सब कुछ बदलने लगा। कमरा… वैसा नहीं रहा। दीवारों पर खून के निशान थे… फर्श पर खरोंचें… जैसे किसी ने जान बचाने की कोशिश की हो। और फिर… उसने देखा— एक लड़का… दीवार से टकरा-टकरा कर अपना सिर फोड़ रहा था। वो चिल्ला रहा था— “मुझे छोड़ दे…
प्लीज… मेरे अंदर मत आ…” राहुल ने पहचान लिया… वो वही लड़का था… जो पिछले साल मरा था। “वो… मैं था…” अमन (या जो भी था) बोला। “ये कमरा… एक दरवाज़ा है…” “और मैं… यहाँ फँस गया…” “मुझे… एक नया शरीर चाहिए था…” राहुल समझ गया। “तू… अमन के अंदर
है…” “था…” “अब… मुझे नया चाहिए…” अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। धड़ाम! राहुल चिल्लाया— “कोई है बाहर!!” लेकिन आवाज़… बाहर तक नहीं जा रही थी। जैसे कमरा किसी और ही दुनिया में बंद हो गया हो। अमन अचानक चारों हाथ-पैर पर झुक गया… जैसे कोई जानवर
हो। और फिर… वो तेजी से राहुल की तरफ दौड़ा। राहुल ने तुरंत पास की कुर्सी उठाकर उसे मारा। अमन दीवार से टकराया… लेकिन अगले ही सेकंड फिर खड़ा हो गया। “तुम… भाग नहीं सकते…” उसकी आवाज़ अब सीधे राहुल के दिमाग में गूँज रही थी। राहुल किसी तरह दरवाज़ा
खोलकर बाहर भागा। कॉरिडोर सुनसान था। वो सीधे वार्डन के कमरे में गया। “सर… प्लीज… कुछ कीजिए… अमन…” वार्डन ने राहुल को देखा… और इस बार… उसके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था। “आखिर… फिर से शुरू हो गया…” “क्या मतलब?” वार्डन धीरे से बोला— “हर साल… कोई ना
कोई… 307 में फँस जाता है…” राहुल का खून जम गया। “और आप कुछ नहीं करते?!” “किया था…” “एक बार… एक पंडित को बुलाया था…” “फिर?” “वो… ज़िंदा बाहर नहीं आया…” राहुल ने हिम्मत जुटाई। “मुझे उस पंडित का तरीका बताइए…” वार्डन कुछ सेकंड चुप रहा… फिर एक पुरानी डायरी
निकालकर दी। “ये… उसी पंडित की है…” “उसने लिखा था… अगर कोई अंदर फँस जाए…” “तो… उस आत्मा को उसके ही दर्द से हराना होगा…” राहुल वापस कमरे में गया। दरवाज़ा अपने आप खुल गया। अंदर अंधेरा था। अमन दीवार पर उल्टा चिपका हुआ था… जैसे कोई कीड़ा। “तुम वापस
आ गए…” “अच्छा है…” राहुल ने डायरी कसकर पकड़ी। “तू… दर्द से डरता है ना…?” अमन हँसा— “मैं ही दर्द हूँ…” राहुल ने डायरी के पन्ने खोले… उसमें लिखा था— “जिस जगह वो मरा… वहीं उसे वापस ले जाओ…” राहुल ने चारों तरफ देखा… फर्श पर एक जगह बाकी से
ज्यादा काली थी। “यहीं…” जैसे ही वो वहाँ पहुँचा… अमन चीखने लगा— “नहीं… वहाँ मत जा…” पहली बार… वो डर रहा था। राहुल ने पूरी ताकत से अमन को पकड़कर उस जगह पर गिरा दिया। अमन जोर-जोर से तड़पने लगा। उसकी आवाज़ बदल रही थी— “मुझे छोड़ दे…” “मैं मरना
नहीं चाहता…” राहुल चिल्लाया— “तू पहले ही मर चुका है!” अचानक… कमरे में तेज हवा चलने लगी। दीवारों से खून टपकने लगा। और फिर… एक जोरदार चीख— “आआआआआआआ!!!” सब कुछ शांत हो गया। अमन जमीन पर बेहोश पड़ा था। उसकी आँखें… अब normal थीं। “राहुल…?” उसने धीरे से कहा। राहुल
की आँखों में आँसू आ गए। “तू ठीक है…” सब कुछ खत्म हो गया था… या कम से कम… ऐसा लगा। कुछ दिन बाद… राहुल हॉस्टल छोड़ने लगा। वो आखिरी बार Room 307 के सामने रुका। दरवाज़ा बंद था। लेकिन अंदर से… हल्की सी आवाज़ आई— “ठक… ठक…” राहुल जम
गया। फिर… धीरे से एक फुसफुसाहट— “तुम… मुझे छोड़कर जा रहे हो…?” राहुल ने धीरे से नीचे देखा… उसके हाथ पर… एक काला निशान उभर आया था। बिल्कुल वैसा ही… जैसा उस मरे हुए लड़के के हाथ पर था। उस रात… राहुल अपने नए कमरे में सो रहा था। अचानक…
उसकी आँख खुली। और उसने खुद को आईने में देखा… उसकी आँखें… धीरे-धीरे काली हो रही थीं। और उसके मुँह से आवाज़ निकली— “अब… मुझे नया घर मिल गया…” कहानी खत्म — लेकिन डर नहीं…

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