College Love Story: Jab Der Se Samajh Aaya Pyaar
मेरा नाम सिया है। और ये कहानी है उस इंसान की… जिसने मेरी पूरी दुनिया बदल दी। सच बताऊँ तो मुझे कभी प्यार-व्यार जैसी चीज़ों पर ज्यादा भरोसा नहीं था। मुझे लगता था ये सब बस फिल्मों में अच्छा लगता है, असल जिंदगी में नहीं। मेरी दुनिया बहुत सीधी थी — घर, कॉलेज, दो-तीन अच्छे दोस्त और बस। लेकिन शायद हर किसी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आता है, जहां सब कुछ बदल जाता है… मेरे साथ भी वही हुआ। ये बात है मेरे कॉलेज के दूसरे साल की।
उस दिन मैं लेट हो गई थी। सुबह अलार्म बजा था लेकिन मैंने बंद करके फिर से सो लिया। जब आंख खुली तो 8:30 हो चुके थे और मेरी क्लास 9 बजे थी। मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर बिना नाश्ता किए ही निकल गई। रास्ते में बस यही सोच रही थी कि आज फिर से लेक्चरर की डांट पड़ेगी। मैं भागते-भागते कॉलेज के गेट के अंदर जा रही थी, तभी किसी से जोर से टकरा गई। मेरे हाथ में जो किताबें थीं, वो सब नीचे गिर गईं। “देख के नहीं चल
सकती क्या?” सामने से आवाज आई। मैंने गुस्से में ऊपर देखा… और वहीं कुछ सेकंड के लिए रुक गई। वो लड़का… शायद मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। हल्की दाढ़ी, आंखों में अजीब सा कॉन्फिडेंस, और चेहरे पर वो attitude… जैसे उसे किसी की परवाह ही नहीं। “सॉरी… मुझे लेट हो रहा था,” मैंने जल्दी से कहा और अपनी किताबें उठाने लगी। वो भी नीचे झुका और मेरी मदद करने लगा। “पहले देख लिया करो, वरना अगली बार किसी और से टकराओगी तो इतना polite नहीं होगा,” उसने हल्की
मुस्कान के साथ कहा। मुझे थोड़ी चिढ़ हुई, लेकिन उस वक्त बहस करने का टाइम नहीं था। “Thanks,” मैंने बस इतना कहा और भाग गई। उस दिन बस इतनी ही मुलाकात हुई… लेकिन मुझे क्या पता था कि ये बस शुरुआत है। अगले दिन मैं टाइम पर कॉलेज पहुंची। क्लास में बैठी थी, तभी पीछे से आवाज आई— “Excuse me, ये सीट खाली है?” मैंने मुड़कर देखा… और वही लड़का। मैं एक सेकंड के लिए चुप रह गई। “हाँ… है,” मैंने धीरे से कहा। वो आकर मेरे बगल में बैठ
गया। “वैसे कल के लिए फिर से sorry,” मैंने खुद ही कह दिया। “इतनी जल्दी sorry बोल देती हो?” उसने हल्का सा हंसते हुए कहा। “गलती मेरी थी,” मैंने सीधा जवाब दिया। “अच्छा है… कम से कम मानती तो हो,” उसने कहा। उसकी बातों में कुछ तो था… थोड़ा annoying, लेकिन interesting भी। “वैसे नाम क्या है तुम्हारा?” उसने पूछा। “सिया,” मैंने कहा। “मैं आरव,” उसने हाथ आगे बढ़ाया। मैंने थोड़ी hesitation के बाद हाथ मिलाया। उसका हाथ गर्म था… और पता नहीं क्यों, उस एक सेकंड में मुझे अजीब
सा feel हुआ। मैंने तुरंत हाथ पीछे कर लिया। धीरे-धीरे हम रोज़ मिलने लगे। पहले बस “hi-hello” होता था, फिर बातें शुरू हो गईं। वो बहुत अलग था। बाकी लड़कों जैसा बिल्कुल नहीं। वो मुझे impress करने की कोशिश नहीं करता था, ना ही फालतू की बातें करता था। लेकिन जब भी बोलता था, सीधा दिल में लगता था। कभी-कभी वो मेरी मजाक भी उड़ाता था। “तुम बहुत ज्यादा सोचती हो,” वो अक्सर कहता था। “और तुम बिल्कुल नहीं सोचते,” मैं जवाब देती थी। “इसलिए तो balance बनता है,” वो
हंस देता था। और मैं… बिना वजह मुस्कुरा देती थी। एक दिन बारिश हो रही थी। कॉलेज खत्म हुआ, तो मैंने सोचा आज जल्दी घर निकल जाऊं। लेकिन बाहर इतनी तेज बारिश थी कि निकलना मुश्किल था। मैं छत के नीचे खड़ी थी, तभी आरव आया। “चलो,” उसने कहा। “कहाँ?” मैंने पूछा। “घर… और कहाँ,” उसने सीधा जवाब दिया। “बारिश देख रहे हो?” मैंने कहा। उसने बैग से एक छाता निकाला। “अब?” उसने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने थोड़ी देर सोचा… फिर उसके साथ चल पड़ी। हम दोनों एक ही छाते
के नीचे थे। बारिश की बूंदें, ठंडी हवा… और वो मेरे बिल्कुल पास। मैंने पहली बार उसे इतने करीब से महसूस किया। “तुम चुप क्यों हो?” उसने पूछा। “कुछ नहीं,” मैंने नजरें बचाते हुए कहा। “झूठ… तुम कुछ तो सोच रही हो,” उसने कहा। मैंने उसकी तरफ देखा… और फिर नजरें झुका ली। “तुम बहुत अजीब हो,” मैंने धीरे से कहा। “और तुम्हें ये अजीब पसंद आ रहा है,” उसने तुरंत जवाब दिया। मैं कुछ नहीं बोली… लेकिन अंदर कहीं ना कहीं वो सही था। उस दिन के बाद सब
बदलने लगा। अब मैं उसे ढूंढने लगी थी। क्लास में, कैंटीन में, हर जगह। अगर वो नहीं दिखता था तो अजीब सा लगता था। और जब दिख जाता था… तो बिना वजह खुशी होती थी। मुझे समझ आ रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। लेकिन मैं मानना नहीं चाहती थी। क्योंकि मुझे डर लगता था। डर इस बात का कि कहीं ये सब एकतरफा ना हो। एक दिन उसने मुझे अचानक पूछा— “तुम मुझसे avoid कर रही हो क्या?” मैं चौंक गई। “नहीं तो,” मैंने कहा। “फिर
इतनी चुप क्यों हो गई हो?” उसने पूछा। मैं कुछ सेकंड तक उसे देखती रही। “कुछ नहीं… बस पढ़ाई का stress है,” मैंने झूठ बोला। वो कुछ देर तक मुझे देखता रहा… जैसे उसे यकीन नहीं हुआ। “ठीक है,” उसने बस इतना कहा। लेकिन उस दिन के बाद वो थोड़ा दूर हो गया। अब वो पहले जैसा नहीं रहा। ना वो बात करता, ना मजाक। और ये चीज़ मुझे अंदर से परेशान करने लगी। मैंने सोचा था दूरी बनाऊंगी… लेकिन अब खुद ही उस दूरी में घुट रही थी। एक
दिन मैं खुद उसके पास गई। “तुम बदल गए हो,” मैंने सीधे कहा। वो हंस पड़ा। “तुमने ही तो कहा था दूरी रखो,” उसने कहा। “मैंने कब कहा?” मैंने पूछा। “कहने की जरूरत नहीं थी,” उसने धीरे से कहा। मैं चुप हो गई। उसकी बात में सच था। उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ… कि मैं उसे खोने से डरने लगी हूँ। और शायद… मैं उसे पसंद करने लगी थी। नहीं… शायद नहीं। पक्का। उस रात मैं सो नहीं पाई। बस यही सोचती रही… क्या वो भी मुझे वैसे
ही feel करता है? या ये सब सिर्फ मेरी तरफ से है? अगर मैंने कह दिया और उसने मना कर दिया तो? और अगर मैंने नहीं कहा… तो कहीं वो हमेशा के लिए दूर ना हो जाए? अगले दिन मैंने decide कर लिया… कि जो होगा देखा जाएगा। मैं उसे सब बता दूंगी। लेकिन जिंदगी इतनी आसान नहीं होती। उस दिन जब मैं कॉलेज पहुंची… तो जो मैंने देखा, उसने सब कुछ बदल दिया। आरव… किसी और लड़की के साथ खड़ा था। वो हंस रहा था… बिल्कुल वैसे ही जैसे
मेरे साथ हंसता था। और वो लड़की… उसके बहुत करीब खड़ी थी। उस पल… मेरे अंदर कुछ टूट गया। मैं वहीं रुक गई। और पहली बार… मुझे सच में डर लगा। शायद… मैं देर कर चुकी थी। उस दिन मैं बस दूर खड़ी उसे देखती रह गई। आरव… और वो लड़की। मेरे कदम जैसे वहीं रुक गए थे। मैं चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी। दिल बार-बार यही कह रहा था — “जाओ, पूछो उससे… कौन है वो?” लेकिन दिमाग कह रहा था — “क्या हक है तुम्हारा?”
मैं चुपचाप मुड़ गई। उस दिन मैंने उससे बात नहीं की। और उसने भी नहीं। पूरे दिन मैं बस उसी के बारे में सोचती रही। क्लास में टीचर क्या पढ़ा रहे थे, कुछ समझ नहीं आया। बस बार-बार वही सीन दिमाग में आ रहा था… उसका हंसना… उसका उसके करीब खड़ा होना… और सबसे ज्यादा… ये कि शायद वो खुश था। मेरे बिना भी। अगले कुछ दिन ऐसे ही निकल गए। हम एक ही जगह होते थे… लेकिन अजनबी बन गए थे। ना वो मेरे पास आता, ना मैं उसके
पास जाती। लेकिन अंदर से… मैं टूट रही थी। एक दिन मेरी दोस्त ने मुझसे पूछा— “सिया, क्या हुआ है तुम्हें? पहले जैसी नहीं रही तुम।” मैंने बस मुस्कुरा दिया। “कुछ नहीं,” मैंने कहा। लेकिन वो समझ गई। “आरव की वजह से ना?” उसने सीधा पूछ लिया। मैं चौंक गई। “नहीं… ऐसा कुछ नहीं है,” मैंने झूठ बोला। वो हंस पड़ी। “तुम झूठ बोलने में बहुत खराब हो,” उसने कहा। मेरी आंखें भर आईं। “मैंने उसे उस लड़की के साथ देखा…” मैंने धीरे से कहा। “तो?” उसने पूछा। “तो… बस
वही,” मैंने नजरें झुका लीं। वो कुछ सेकंड चुप रही… फिर बोली— “तुमने उससे पूछा?” “नहीं,” मैंने कहा। “तो फिर decide कैसे कर लिया कि सब खत्म?” उसने कहा। मैं चुप हो गई। शायद वो सही थी। उस रात मैंने बहुत सोचा। भागना आसान था… लेकिन शायद सही नहीं। अगर कुछ था… तो उसे समझना भी जरूरी था। अगले दिन मैं सीधा उसके पास गई। वो कैंटीन में बैठा था… अकेला। दिल बहुत तेज धड़क रहा था। “आरव,” मैंने आवाज दी। उसने ऊपर देखा। कुछ सेकंड के लिए हम दोनों
बस एक-दूसरे को देखते रहे। फिर उसने नजरें हटा लीं। “हाँ?” उसने ठंडे तरीके से कहा। उसका ऐसा behavior मुझे चुभ गया… लेकिन मैं रुकी नहीं। “मुझे तुमसे बात करनी है,” मैंने कहा। “बोलो,” उसने कहा। “यहाँ नहीं,” मैंने कहा। हम दोनों कैंटीन के बाहर आ गए। कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर मैंने हिम्मत करके पूछा— “वो लड़की कौन थी?” उसने मेरी तरफ देखा। “कौन?” उसने ऐसे पूछा जैसे उसे कुछ पता ही नहीं। “जो उस दिन तुम्हारे साथ थी,” मैंने कहा। वो कुछ सेकंड चुप रहा…
फिर हल्का सा मुस्कुराया। “तुम्हें क्या फर्क पड़ता है?” उसने कहा। उसका ये सवाल… सीधा दिल में लगा। मैं चुप हो गई। लेकिन इस बार मैं भागी नहीं। “फर्क पड़ता है,” मैंने धीरे से कहा। वो मेरी तरफ देखने लगा। “क्यों?” उसने पूछा। अब छुपाने का कोई मतलब नहीं था। “क्योंकि… मुझे तुम पसंद हो,” मैंने एक ही सांस में कह दिया। सब कुछ जैसे एक पल के लिए रुक गया। हवा भी… आवाजें भी… सब। वो बस मुझे देखता रहा। कोई जवाब नहीं। उसकी खामोशी मुझे डराने लगी। “कुछ
बोलो,” मैंने कहा। वो धीरे से हंसा… लेकिन उस हंसी में पहले वाली warmth नहीं थी। “सिया… तुम्हें बहुत देर हो गई,” उसने कहा। मेरे दिल की धड़कन रुक सी गई। “मतलब?” मैंने मुश्किल से पूछा। “मतलब ये कि… जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी, तब तुम दूर चली गई,” उसने कहा। मैं कुछ नहीं बोल पाई। “मैं समझ नहीं पाया कि तुम क्या चाहती हो,” वो आगे बोला। “और मैं guessing game नहीं खेलता।” मेरी आंखों में आंसू आ गए। “मैं डर गई थी…” मैंने धीरे से कहा। “और अब?”
उसने पूछा। “अब… मैं और नहीं भाग सकती,” मैंने कहा। वो कुछ देर तक चुप रहा। फिर उसने गहरी सांस ली। “वो मेरी cousin थी,” उसने कहा। मैं चौंक गई। “क्या?” मैंने कहा। “हाँ… वो बस मुझसे मिलने आई थी,” उसने कहा। मेरे अंदर जैसे सब कुछ एक साथ टूट भी रहा था… और जुड़ भी रहा था। “तो तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?” मैंने कहा। “तुमने पूछा कब?” उसने सीधा जवाब दिया। मैं चुप हो गई। गलती मेरी भी थी। कुछ सेकंड तक हम दोनों चुप रहे। फिर
उसने धीरे से कहा— “लेकिन अब भी एक problem है।” “क्या?” मैंने पूछा। “मैंने खुद को समझा लिया था कि तुम interested नहीं हो,” उसने कहा। “और अब अचानक…” मैंने उसकी बात काट दी। “तो अब क्या करोगे?” मैंने पूछा। वो मेरी तरफ देखने लगा। “पता नहीं,” उसने honestly कहा। मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। “मैं कर सकती हूँ wait,” मैंने कहा। “लेकिन इस बार… मैं भागूंगी नहीं।” वो मुझे देखता रहा। फिर धीरे से मुस्कुराया। वो वही मुस्कान थी… जिससे सब शुरू हुआ था। “तुम बहुत complicated हो,” उसने
कहा। “और तुम बहुत simple,” मैंने जवाब दिया। “तो फिर balance बन जाएगा,” उसने हंसते हुए कहा। उस दिन… कुछ officially start नहीं हुआ। ना उसने propose किया… ना मैंने। लेकिन कुछ बदल गया था। इस बार… हम दोनों ने कोशिश करने का फैसला किया। साथ में। धीरे-धीरे सब ठीक होने लगा। हम फिर से बातें करने लगे… हंसने लगे… साथ time spend करने लगे। लेकिन इस बार एक फर्क था। अब हमें पता था… हम एक-दूसरे के लिए क्या feel करते हैं। एक दिन उसने अचानक मुझसे पूछा— “अगर
उस दिन तुम नहीं आती… तो?” मैंने थोड़ा सोचा। “तो शायद… मैं आज भी regret कर रही होती,” मैंने कहा। वो मुस्कुराया। “अच्छा हुआ तुम आ गई,” उसने कहा। मैंने उसकी तरफ देखा… और उस पल मुझे समझ आ गया— प्यार हमेशा perfect नहीं होता। कभी confusion होता है… कभी डर… कभी ego। लेकिन अगर दोनों लोग सच में चाहें… तो रास्ता मिल ही जाता है। और शायद… यही प्यार होता है। (THE END ❤️)
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